4 September 2015

बदलाव लाने में अक्षम यह लोक लुभावन फैसला

        इलाहबाद उच्च न्यायलय ने 18 अगस्त 2015 को बेहद ‘लोकप्रिय’ फैसला सुनाया। यह फैसला कहता है कि सभी सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, जज, जनप्रतिनिधि अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ायेंगे। न्यायलय के इस फैसले के बाद तमाम बुद्धिजीवी बेहद खुश नजर आ रहे हैं। वे इसे सरकारी स्कूलों के हालात में सुधार व पैसे के आधार पर शिक्षा में भेदभाव की समाप्ति के तौर पर देख रहे हैं।

        न्यायलय के इस फैसले के वास्तविकता में उतरने में सबसे बड़ी बाधा तो यह पूंजीवादी समाज ही है। जिसका की एक अंग न्यायलय भी हैदोहरी शिक्षा व्यवस्था (अमीरों के लिए अलग और गरीबों के लिए अलग स्कूल) इसीलिए है क्योंकि समाज अमीर-गरीब में बटा है। एक तरफ पूंजीपति वर्ग है तो दूसरी ओर गरीब मजदूर मेहनतकश। जब तक यह भेद समाज से समाप्त नहीं होगा तब तक समान शिक्षा की बात दिवास्पप्न में जीना है, वैसे ही जैसे यह सोचना कि शिक्षा में कानूनी तौर पर समानता पैदा करके समाज से अमीरी-गरीबी का भेद खत्म हो जायेगा।
        एक बार के लिए मान भी लिया जाए कि यह फैसला अपनी पूर्णतः में लागू हो जाए। हालांकि अभी इसे पूंजीवादी व्यवस्था के अन्य अंग सर्वोच्च न्यायलय की बाधा भी पार करनी है। फिर भी यह लागू हो जाये तो हम जल्द ही देखेगें कि गरीबों के लिए अभावग्रस्त स्कूल और अमीरों के लिए पूर्णतः सम्पन्न स्कूलों की पूरी श्रृंख्ला पैदा हो जायेगी।जिन्हें किसी ना किसी रूप में आज भी विभिन्न तकनीकी-पेशागत शिक्षण संस्थानों में देखा जा सकता है। इस फैसले से यह सब प्राथमिक-माध्यमिक शिक्षा में भी देखा जाने लगेगा। यानि दो तरह के स्कूल सरकारी खर्च में दोनों वर्गों के लिए खोले जायेगें। इस तरह न्यायलय का मान भी रह जायेगा और पूंजीपति वर्ग की शान भी।
        जब पूंजीपति वर्ग की चाहत निजीकरण हो ओर वह उसी दिशा में बढ रहा हो। तो ऐसे समय में कोर्ट का शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ फैसला कैसे लागू हो सकता है। इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
        इन सभी वजहों से न्यायलय का यह फैसला लोक लुभावन है। ये ज्यादा से ज्यादा मरे दर्जे का सुधार ही साबित होगा। शिक्षा व समाज में पूर्ण समानता का रास्ता कोर्ट के फैसलों या किन्हीं सुधारों के जरिये हासिल नहीं किया जा सकता है। इसके लिए समाज को समाजवादी क्रांति की आवश्यकता है। नौजवनों को इसी दिशा में अपने प्रयासों को और तेज करने की आवश्यकता है।

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