सीरिया से बड़े पैमाने पर लोग अपना घर-बार छोड़कर दर-दर भटक रहे हैं।ये सभी यूरोपीय देशों में शरण लेने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। असुरक्षित यात्रा में कई लोग भूख-प्यास से भी मर जा रहे हैं। बीबीसी के अनुसार इस वर्ष 3 लाख 40 हजार लोग अपना वतन छोड़कर शरण लेने के लिए मजबूर हुए हैं। सीरियाई लोगों का दर्द देखकर यूरोपीय देशों के नागरिकों ने उनका साथ देने के लिए प्रदर्शन किये। इसके बावजूद पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासक शरणार्थियों को अनचाहा बोझ समझकर तरह-तरह के बहाने बनाकर इसे रोकना चाहते हैं। हंगरी ने तो शरणार्थियों को रोकने के लिए तार-बाड़ खड़ी कर दी है। साम्राज्यवादी आईएसआईएस की उनके देश में घुसपैठ का बहाना बनाकर शरणार्थियों को शरण देने में अडंगे लगा रहा है। इस सबके बावजूद एक दिन भी ऐसा नहीं गया जबकि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों ने मानवता के नाम पर झूठे आंसू ना बहाये हों।
साम्राज्यवाद ने ही अपने घृणित हितों के कारण इस समस्या को जन्म दिया है। उसने ही सीरिया, इराक, लीबिया, यमन आदि-आदि को बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। मुल्कों पर हमला कर भांति-भांति के आतंकवादी-कट्टरपंथी पैदा कर दिये। यहां के संसाधन लूटकर इन्हें कंगाल कर दिया।
आईएसआईएस को अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा पैदा किया गया। उसे खतरनाक हथियार साम्राज्यवादियों द्वारा ही मुहैय्या करवाये गये। अब यह भस्मासुर हैवानियत पर उतरा है तो इसका जिम्मेदार साम्राज्यवाद ही है। सीरिया की जनता यदि युद्ध में तबाह हो रही है, अपने देश छोड़ने को मजबूर हो रही हैं तो इसका मुख्य कारण साम्राज्यवाद है।
पहले तो जनता की बर्बादी का सारा साजेा सामान तैयार किया, उसे बर्बाद किया। अब बर्बाद जनता के आंसू पोंछने का नाटक कर साम्राज्यवादी मानवता-मानवता चिल्ला रहे हैं। और सीरियाई लोगों को शरण देने के नाम पर दांये-बांये कर रहे हैं। यह साम्राज्यवादी शासकों की अमानवीयता की झलक है।

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