24 September 2015

कालेज-कैम्पसों को ‘जेल’ बनाए जाने का विरोध करो!

कालेजों-विश्वविद्यालयों में जनवादी माहौल हो, इसके लिए छात्र-छात्राओं ने इतिहास में जुझारू संघर्षो को खड़ा किया है। पूंजीवादी शासकों की भरसक कोशिश रही है कि युवा हमेशा उनके इसारे पर नाचते रहें। पूंजीवादी शसक छात्रों की जनवादी-क्रांतिकारी सोच व संघर्ष से भय खाते रहे हैं। देश में जनवाद, लोकतंत्र का राग अलापने के बरक्स वह छात्रों के राजनीतिक अधिकारों को सैकड़ों तरीको से कुचलते रहे है। किन्तु छात्र समुदाय ने अपने व देश-दुनिया के क्रांतिकारी संघर्षो से जो चेतना हासिल की, उसके कारण वह अपने जनवादी अधिकारों के प्रति सचेत रहा है। परन्तु शासक वर्ग इस सीमित जनवाद को भी खत्म करना चाहता है। UGC(विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा अप्रैल 2015 में जारी की गयी गाइडलाइन भी शासक वर्ग की इसी चाहत को पूरा करती प्रतीत होती है।
       छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के नाम पर UGC द्वारा जारी किया गया तुगलकी फरमान कहता है कि, 1. कालेजों की दीवारों को और उंचा कर दिया जाए जिससे की उसे आसानी से पार ना किया जा सके 2. दीवारों पर तारबाड़ी लगी हो 3. कैम्पसों में पुलिस थाने खोले जाए 4. कालेजों-हास्टलों में कैमरे लगे होने चाहिए 5. कालेजों-हास्टलों में छात्र-छात्राओं का प्रवेश बायोमैट्रिक पहचान के आधार पर हो 6. शिक्षक, छात्र-छात्राओं की गतिविधि पर नजर रखे तथा कुछ भी समस्या पाए जाने पर अभिभावकों से बात करे।
       ये सारे फरमान छात्रों की सुरक्षा के नाम पर जारी किए गए है। इन सारे फरमानों से कुछ सवाल उठने लाजिमी है। जैसे कि- क्या कालेज-कैम्पसों में हर समय पुलिस की मौजूदगी छात्रों के विरोध करने के जनवादी अधिकार पर हमला नही बोलेगी? क्या छात्र-छात्राओं की हर गतिविधि पर कैमरों से रखी जाने वाली नजर उनकी नीजता पर हमला नही होगा? क्या छात्रों की प्रत्येक गतिविधि पर शिक्षकों-अभिभावकों की निगरानी, उनके विकास को अवरूद्ध नही करेगी?
       इन सारे ही सवालों का जवाब हां है। फिर भी UGC द्वारा ये कदम उठाया जा रहा है तो इसके निश्चित कारण है। 2 साल पहले भी UGC द्वारा सभी कालेजों को, छात्रो के निरंतर उग्र होते जाने की बढ़ती प्रवर्ती पर चिन्ता जताते हुए आवश्यक कदम उठाने की बात कही गयी थी। दरअसल बढ़ती बेरोजबारी, समाज के सांस्कृतिक संकट ने युवा पीढ़ी को बर्बादी की ओर धकेल दिया है। पहले कांग्रेस व अब 1 साल से मोदी सरकार द्वारा जारी की गयी नीतियां इस संकट को और अधिक बढ़ाने का ही काम कर रही है। इस संकट ने छात्रों में अत्यधिक उग्रता, क्षोभ व गुस्से को पैदा किया है। फिलवक्त शासक वर्ग इस गुस्से को गलत दिशा में मोड़ने में सफल रहा है। परंतु भविष्य में एक सही दिशा मिलने पर यही गुस्सा व्यवस्था विरोध तक भी जा सकता है। इसे शासक वर्ग ‘अरब बसंत’ व अन्य उदाहरणों से जानता है। ऐसे में वो पहले से ही अपने बचाव के रास्ते खड़े कर लेना चाहता है। उंची दीवारें छात्रों को बाहरी दुनिया से काटकर उन्हें और अधिक एकांगी बनाने का जरिया है। छात्रों की पुलिस व कैमरों द्वारा निगरानी छात्र आंदोलनों को कुचलने व उन्हें अनुशासित बनाने का प्लान है।
       UGC की पूरी ही गाइडलाइन कालेज-कैम्पसों को ‘जेलों’ में बदलने की कोशिश है। जहां छात्र-छात्राएं कैदी होंगे तो डीन व वी.सी. जेलर। इसलिए जरूरी हो जाता है कि छात्रों के जनवादी अधिकारों पर हमला करने वाली इस गाइडलाइन को इसकी सही जगह ‘कूड़े के ढ़ेर’ में पहुंचाया जाए।

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