18 November 2015

असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी

इन दिनों साहित्यकारों और कलाकारों द्वारा पुरस्कार वापसी की बाढ़ आ गयी है। उदय प्रकाश से लेकर अरूंधति राय समेत दर्जनों लोग पुरस्कार वापसी कर चुके हैं। यह क्रम अभी भी जारी है। साहित्यकारों, कलाकारों की यह क्षुब्धता बीते समय में देश में बढ़ी असहष्णिुता का प्रतिकार है। कन्नड़ विद्वान कलबुर्गी की हत्या जैसी घटनाएं समाज में बढ़ी हैं। वहीं दादरी में अखलाक की दर्दनाक हत्या ने पूरे समाज को ही क्षुब्धता से भर दिया है। देश कहां जा रहा है? जैसा सवाल तीखे ढंग से सभी के सामने आ उपस्थित हुआ है।
        देश में मजबूत हो रहा फासीवादी आंदोलन समाज के प्रगतिशील लोगों समेत हर विविधता के लिए जगह कम कर रहा है। हर चीज पर पहरे, बंदिशें, हमले बढ़े हैं। ऐसे समय में साहित्यकारों-कलाकारों के विरोध का यह रूप निश्चित ही काबिले तारीफ है। साहित्यकारों और कलाकारों के विरोध से संघी ताकतें बौखला गयी हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे उन्हें बार-बार सुईयां चुभौयी जा रही हैं। ये इस विरोध को कांग्रेस-वामपंथियों द्वारा प्रायोजित, कागजी विरोध आदि-आदि कहकर नकार रहे हैं। 
  पर इतना काफी नहीं है फासीवादी आंदोलन के खिलाफ सशक्त प्रतिरोध खड़ा करने के लिए साहित्यकारों-कलाकारों को अपनी रचनाओं व अन्य विधाओं के जरिये भी फासीवाद पर हमला बोलना होगा। अगर भारत के संघी हिटलर, मुसोलिनी के वंशज हैं तो लेखकों को भी ब्रेख्त बनना होगा। 
  भारत में फासीवादी आंदोलन जितनी तेजी से बढ़ रहा है उसमें और कड़ा मुकाबला करने की आवश्यकता है। भारत में फासीवादी आंदोलन की मौजूदा बढ़त संकट ग्रस्त पूंजीवादी व्यवस्था की ही पैदाइश है। इसीलिए फासीवादी आंदोलन से मुकाबला करते हुए इसकी जड़ पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष भी वक्त की मांग है।  

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