15 December 2015

शासकों के दमन के बाद भी जल रही है आक्यूपाई यूजीसी आंदोलन की मशाल

        यू.जी.सी. द्वारा अक्टूबर में नाॅन नेट फेलोशिप को खत्म किये जाने की घोषणा के बाद से शुरू हुआ आक्यूपाई यू.जी.सी. आंदोलन निरंतर जारी है। 21 अक्टूबर से शुरू हुए इस आंदोलन को निरंतर ही सरकार के दमन का सामना करना पड़ा है। 23 अक्टूबर, 27 अक्टूबर के बाद अब 9 दिसम्बर को छात्रों को पुलिसिया दमन सहना पड़ा। 9 दिसम्बर को छात्रों की पहले से ही प्रस्तावित रैली पर दिल्ली पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया। यू.जी.सी. भवन से संसद मार्ग तक शांतिपूर्वक रैली निकाल रहे छात्रों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए, वाटर कैनन से उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया। पुलिस द्वारा छात्राओं को टारगेट करके हमला किया गया। लगभग 150 छात्रों को गिरफ्तार करके थाने ले जाया गया जहां देर रात उन्हें छोड़ दिया गया। पुलिस के इस हमले में लगभग डेढ़ दर्जन छात्र/छात्राएं घायल हुए। इस भारी दमन के बाद भी छात्रों का हौंसला टूटा नहीं है और उन्होंने 14 दिसम्बर को इस पुलिसिया दमन के खिलाफ तथा आंदोलन के समर्थन में पूरे देश में प्रदर्शन करने की अपील सभी छात्र संगठनों से की है।

        आक्यूपाई यू.जी.सी. आंदोलन की शुरूआत 7 अक्टूबर को यू.जी.सी. द्वारा किए गये उस फैसले के बाद हुयी जिसमें यू.जी.सी. ने नाॅन नेट फेलोशिप को बंद कर दिये जाने की योजना पर सहमति जताई थी। दरअसल 2006 से ही यू.जी.सी. द्वारा केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में एम.फिल. व पी.एच.डी. करने वाले उन सभी छात्रों को जिन्होंने नेशनल एलिजबिलटी टेस्ट(नेट) पास नहीं किया है या जिन्हें जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जे.आर.एफ.) नहीं मिलती है, स्कोलरशिप दी जाती रही है। एम.फिल. के छात्रों को 5000 रुपये प्रति माह तथा पी.एच.डी. छात्रों को 8000 रुपये प्रति माह फेलोशिप दी जाती थी। फेलोशिप बंद करने के पीछे यू.जी.सी. का यह तर्क था कि इस योजना में पारदर्शिता की कमी थी, जिसके कारण योग्य छात्रों को फेलोशिप नहीं मिल पाती थी। साथ ही धन की कमी के कारण भी यू.जी.सी. यह फेलोशिप देने मे असमर्थ थी। 
        20 अक्टूबर को जैसे ही ये खबर अखबारों के माध्यम से छात्रों के बीच पहुंची, छात्रों ने इसका विरोध करने की रणनीति बनायी। 21 अक्टूबर को भारी संख्या में छात्र नई दिल्ली स्थित यू.जी.सी. मुख्यालय में यू.जी.सी. अध्यक्ष वेदप्रकाश से मिलने पहुंचे परन्तु वेदप्रकाश आॅफिस से गायब थे। गुस्साए छात्रों ने यू.जी.सी. मुख्यालय को ही अपने आंदोलन का केन्द्र बनाते हुए वहां डेरा डाल दिया। वेदप्रकाश से मिलने की मांग पर अड़े छात्र तब से वहीं डटे हैं। इस बीच इन 50 से अधिक दिनों में छात्रों को तीन बार पुलिसिया दमन का सामना करना पड़ा। परन्तु शिक्षकों, बुद्धिजीवियों तथा देश के कोने-कोने से मिल रहे हजारों-छात्रों के समर्थन की ऊर्जा से छात्रों ने संघर्ष की मशाल को जलाए रखा है। दिल्ली से शुरू हुआ ये आंदोलन हैदराबाद, अलीगढ़, शिलांग, चेन्नई, मुंबई, कोलकाता, वर्धा, इलाहाबाद, पांडिचेरी, पंजाब, रोहतक विश्वविद्यालय में भी पहुंच चुका है। वहां भी आक्यूपाई आंदोलन के समर्थन में छात्रों ने विरोध-प्रदर्शनों को आयोजित किया है। 
        आक्यूपाई यू.जी.सी. आंदोलन को एक छोटी सफलता अपने शुरूआती दौर में ही मिल गयी। जब छात्रों के विरोध को देखते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एम.एच.आर.डी.) ने 25 अक्टूबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बयान दिया कि सरकार ने यू.जी.सी. द्वारा नाॅन नेट फेलोशिप दिये जाने की मामले की जांच के लिए एक समीक्षा समिति बनाने का फैसला किया है जो दिसम्बर में अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट देगी। उसके बाद ही इस बारे में कोई फैसला किया जाएगा। तब तक यू.जी.सी. का निर्णय स्थगित है, सभी मौजूदा फेलोशिप जारी रहेंगी। 
        यू.जी.सी. के इस फैसले के बाद भी छात्रों ने अपने आंदोलन को जारी रखा। छात्रों का कहना था कि एम.एच.आर.डी. आंदोलन को तोड़ने के लिए दिसम्बर का समय ले रही है। साथ ही दिसम्बर में नैरोबी (केन्या) में डब्ल्यू.टी.ओ. की बैठक में भारत सरकार उच्च शिक्षा को विदेशी व्यापार के लिए खोलने के प्रस्ताव पर हरी झण्डी दिखाने वाली है इसलिए भी समीक्षा समिति की रिपोर्ट के लिए दिसम्बर तक का समय लिया गया है। छात्रोें का मानना है कि सरकार फेलोशिप में कटौती करते हुए उसे मेरिट के आधार पर जारी रखने की योजना बना रही है। इस तरह की कटौती के जरिए सरकार फेलोशिप पाने वाले छात्रों की संख्या को कम कर कुछ चुनिंदा छात्रों को ही फेलोशिप देने की मंशा रखती है। ऐसे में इस तरह की किसी भी कटौती का विरोध करते हुए छात्रों का कहना है कि भारत में स्नातक, परास्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कोई भी छात्र बिना सरकार की मदद के शोध का काम जारी नहीं रख सकता। शोधार्थी छात्र अपने शोध के जरिए सामाजिक ज्ञान को आगे बढ़ाता है। ऐसे में सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह प्रत्येक शोधार्थी छात्र की आर्थिक मदद करे। 
        अक्टूबर से शुरू हुए इस आंदोलन का दायरा भी निरंतर व्यापक होता गया है। आंदोलनरत छात्रों ने अपने शुरूआती दौर से ही इसे देशव्यापी बनाने की कोशिश की। इसी रोशनी में देश भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आये छात्रों को लेकर समन्वय समिति का निर्माण किया गया तथा साथ ही अपनी मांगों के दायरे को बढ़ाते हुए व्यापक छात्रों को इस आंदोलन का भागीदार बनाने की कोशिश की गयी। आज आक्यूपाई आंदोलन निम्न मांगों को लेकर संघर्षरत है-

1. यूजीसी और एम.एच.आर.डी. को स्पष्ट तौर पर नोटिफिकेशन जारी करना चाहिए कि 7 अक्टूबर को जारी यू.जी.सी. का निर्णय मान्य नहीं होगा।
2. इस तरह के किसी भी प्रावधान को वापस लेना चाहिए जो मेरिट या आर्थिक आधार पर शोधार्थी छात्रों को फेलोशिप से वंचित करता हो। 
3. फेलोशिप की मौजूदा राशि 5000/8000 रुपये से बढ़ाकर इसे 8000/12000 रुपये प्रति माह किया जाए तथा इसे महंगाई सूचकांक से जोड़ा जाए। 
4. फेलोशिप केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के साथ राज्य विश्वविद्यालयों में भी बिना किसी भेदभाव के लागू की जाए।
5. शिक्षा के निजीकरण के सभी प्रयास बंद किए जाएं तथा भारत सरकार डब्ल्यू.टी.ओ. में उच्च शिक्षा को व्यापार को खोलने के लिए जारी किए गये प्रस्ताव को वापस ले। 

पछास आंदोलन में शामिल सभी छात्रों को क्रांतिकारी सलाम पेश करता है तथा सभी जनवादी, प्रगतिशील व मुक्तिकामी छात्रों, ताकतों से आहवान करता है कि व इस आंदोलन के समर्थन में आगे आए।

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