जेएनयू प्रकरण ने इस बात को बहुत अच्छी तरह से स्थापित किया है कि देश में फासीवादी खतरा हमारे समाने मुंह बांए खड़ा है। इसी प्रकरण ने ये भी स्थापित किया कि ये संघी सरकार अपने घृणित मंसूबों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाकर छल-कपट कर सकती है। मीडिया के जरिए फर्जी वीडियो को प्रचारित कर जनता के बीच अंधराष्ट्रवादी माहौल तैयार किया गया। पुलिस का इस्तेमाल कर जेएनयू को छावनी में तबदील कर दिया गया। व्यवस्था का एक-एक पुर्जा तथाकथित देशभक्ति की आड़ में तथाकथित देशद्रोहियों को कुचलने को तैयार हो गया। तमाम तरह के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित संघी सरकार के सामने देश के छात्र-नौजवानों का चुनौती प्रस्तुत करना निश्चित ही काबिले तारीफ है। सटीक क्रांतिकारी समझ और क्रांतिकारी जुझारूपन इस संघर्ष को नयी उंचाईयां देगा, संघी फासीवाद की कब्र को और गहरा करेगा।
दरअसल वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था भी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। यह संकट बढ़ती बेरोजगारी, अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई, आम जनता के लगातार बुरे हालात में पहुंचते जीवन के रूप में दिखाई देता है। मेहनतकश जनता कहीं ‘अच्छे दिनों’ का हिसाब मांगना शुरू ना कर दे इस डर से मोदी सरकार लगातार जुमलों पर जुमले समाज में फेंक रही है। जेएनयू मामले से उसने एक नया जुमला समाज में फेंका है और वो है ‘देशद्रोह’ का।
संघी सरकार की देशभक्ति, देश के पूंजीपतियों की सेवा करने में है। अन्य पूंजीवादी पार्टियों के समान ही इसका राष्ट्रवाद पूंजीपति वर्ग के बाजार को सुरक्षित रखने वाला है। संघी फासीवादियों का राष्ट्रवाद देश को विदेशी पूंजीपतियों के हाथों बेच रहा है, साम्राज्यवादी डाकूओं की जी हजूरी में लगा है और इस सब के विरोध में उठने वाली हर आवाज को कुचल रहा है। इस संघी गिरोह ने कभी भी साम्राज्यवादी डाकूओं, सामंतवाद से कोई संघर्ष नहीं किया है। पूंजीवादी शासकों का राष्ट्रवाद शोषण-उत्पीड़न बरकरार रखने वाला, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं को कुचलने वाला राष्ट्रवाद है। इसके बरक्स मजदूर- मेहनतकश वर्ग का राष्ट्रवाद सभी प्रकार के शोषण उत्पीड़न को खत्म करने की मांग करता है। इसी कारण वह राष्ट्रीयताओं के भी शोषण उत्पीड़न के खिलाफ खड़ा है। इससे भी आगे बढ़कर मजदूर-मेहनतकश की सोच अंतराष्ट्रीयतावाद की है। वह दुनिया के सभी देशों के शासकों को अपना शत्रु व मेहनतकशों को अपना मित्र घोषित करता है। देश के मजदूर-मेहनतकश वर्ग की नजर से देखें तो आज देश में यदि कोई सबसे बड़ा देशद्रोही है तो वह है देश का पूंजीपति शासक। इसी तरह पूंजीपति की नजर में यदि कोई सबसे बडा देशद्रोही है तो वह है देश का मजदूर-मेहनतकश, सच बात कहने वाला हर शख्स।
संघी फासीवादी, संविधान-लोकत्रंत की दुहाई देकर छात्रों पर देशद्रोह का फतवा जारी कर रहे हैं। और इसी की दुहाई देकर हमारे बीच के भी कुछ लोग अपने को परम देशभक्त साबित कर रहे हैं। संघी फासीवादी जिनका कभी भी देश प्रेम का कोई उदाहरण नहीं रहा के पैमान पर हम अपने देशप्रेम को नहीं तौल सकते। इस सब से संघ के घृणित विचारों को ही बल मिलेगा और इससे अभी भी गिरफ्तार साथियों की रिहाई का आंदोलन कमजोर होगा।
पूंजीवादी व्यवस्था में आज जो नाममात्र का जनवाद हमें हासिल है वह हमने छीन कर हासिल किया है। संघी गुण्डावाहिनी सत्ता पर काबिज होकर हर तरह के जनवाद को छीन लेना चाहती है। यह हमारा हक ओर दायित्व है के कि हम देश-दुनिया के हर न्यायप्रिय आंदोलन के साथ खडे हों, बिना किसी भय के अपने विचारों को बोल और लिख सकें। किन्तु संघी सरकार यह सब खत्म कर देना चाहती है। वह चाहती है जो उसे पसंद हो पूरा देश वही बोले, वही लिखे। ऐसे हालात में हमें संघी फासीवादियों का पुरजोर विरोध करते हुए जनवादी अधिकरों की रक्षा में खड़ा होना होगा।
संघी फासीवादियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए हमें देश के पूंजीवादी निजाम के खिलाफ भी अपने संघर्ष को केन्द्रित करना होगा। पूंजीवादी निजाम अपने पतन के दौर में संघ जैसे फासीवादी ताकतों को पैदा करता ही रहेगा। इसीलिए जब तक पूंजीवाद है तब तक फासीवाद का खतरा बरकरार है। इससे बचाव का एक ही रास्ता है क्रांति का रास्ता।
आइए फासीवाद के खिलाफ क्रांति का रास्ता चुनें। पूंजीवादी व्यवस्था की जगह समाजवाद कायम करने के संघर्ष को आगे बढ़ाए। यही हमारी मुक्ति का रास्ता है।
यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्क
न उनकी रस्म नयी है न अपनी रीत नयी।।
यूं ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नयी है न अपनी जीत नई।।
न उनकी रस्म नयी है न अपनी रीत नयी।।
यूं ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नयी है न अपनी जीत नई।।

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