साथियो,
23 मार्च भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरू की शहादत का दिन है और 25 मार्च गणेश शंकर विद्याथीं का। 23 मार्च 1931 को जहां भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरू ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से लोहा लेते हुए एवं समाजवादी भारत बनाने के लिए संघर्ष करते हुए अमर हो गये। वहीं 25 मार्च 1931 को कानपुर में सांप्रदायिक दंगा रोकने में गणेश शंकर विद्यार्थी शहीद हुए।
भारतीय इतिहास में भगत सिंह वह शख्सियत हैं, जो जुल्मों-सितम के खिलाफ संघर्ष करने वालों को हमेशा प्रेरणा देते रहेंगें। अत्याचारी और अन्यायी ब्रिटिश साम्राज्यवाद का उन्होंने बहादुरी से मुकाबला किया और देश में साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने के लिए मजदूरों-मेहनतकशों और युवाओं को प्रोत्साहित किया। ठीक इसी कारण गुलामी के खिलाफ, साम्राज्यवादी शोषण व लूट के खिलाफ कभी न हार मानने वाले संघर्ष का भगत सिंह प्रतीक बन गये। भगत सिंह मजदूर-मेहनतकशों, युवाओं की मुक्ति समाजवाद में देखते थे।
आज पूंजीवादी व्यवस्था घोर संकट का शिकार है तथा लाख कोशिशों के बाद भी वह संकट से उबर नहीं पा रही है। पूंजीवाद का यह संकट छात्रों-नौजवानों के मध्य बढ़ती बेरोजगारी के रूप में, सामाजिक मदों में कटौती के साथ शिक्षा बजट में कटौती के रूप में प्रस्तुत है। मजदूरों-मेहनतकशों के श्रम की लूट बेतहाशा बढ़ गयी है। बढ़ती महंगाई ने उनके जीवन के कष्टों को और बढ़ा दिया है। इन समस्याओं से परेशान छात्र-नौजवान व मजदूर-मेहनतकश जनता के आक्रोश को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए समाज का तीव्र फासीवादीकरण किया जा रहा है।
आज पूंजीवादी व्यवस्था घोर संकट का शिकार है तथा लाख कोशिशों के बाद भी वह संकट से उबर नहीं पा रही है। पूंजीवाद का यह संकट छात्रों-नौजवानों के मध्य बढ़ती बेरोजगारी के रूप में, सामाजिक मदों में कटौती के साथ शिक्षा बजट में कटौती के रूप में प्रस्तुत है। मजदूरों-मेहनतकशों के श्रम की लूट बेतहाशा बढ़ गयी है। बढ़ती महंगाई ने उनके जीवन के कष्टों को और बढ़ा दिया है। इन समस्याओं से परेशान छात्र-नौजवान व मजदूर-मेहनतकश जनता के आक्रोश को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए समाज का तीव्र फासीवादीकरण किया जा रहा है।
एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग और संघ केे गठजोड़ ने छात्रों-नौजवानों, मजदूर-मेहनतकशों पर चैतरफा हमला बोल दिया है। एक तरफ जहां पूंजीपति को राहत दी जा रही है, वहीं मजदूर-मेहनतकशों को निचोड़ा जा रहा है। वहीं संघी सरकार अंधराष्ट्रवाद, सांप्रदायिक विचारों से मजदूर-मेहनतकशों, छात्रों-दलितों को निशाना बना रही है। जो कोई संघ की विचारधारा की आलोचना करता है, उसे देशद्रोही कहकर बदनाम किया जा रहा है। जाहिर है संघी फासीवादी सीमित जनवाद को भी खत्म कर फासीवादी राज्य कायम करना चाहते हैं। जो कोई भी उनके रास्ते में रूकावट डालता है, उसे या तो मार दिया जा रहा है या देशद्रोही घोषित किया जा रहा है।
ऐसे समय में भगत सिंह और गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत को याद करना और उनके विचारों को ग्रहण करना अति महत्वपूर्ण हो जाता है। संघ जैसी सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ बोलते हुए भगत सिंह ने कहा था ‘‘लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिये की तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकंड़ों से बचकर रहना चाहिये। और इनके हत्थे चढ़ कुछ नहीं करना चाहिये। संसार के सभी गरीबों के चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही है। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हों। जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी।’’
जेएनयू मामले में जिस तरीके से झूठे वीडियो दिखाकर संघियों की अंधराष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार कर जनता को उन्माद में पहुंचाने का प्रयत्न किया। उसने दिखा दिया है कि पूंजीपति वर्ग के ये चैनल व अखबार कितने ‘निष्पक्ष’ हैं। पत्रकार के रूप में गणेश शंकर विद्यार्थी ने मजदूर-मेहनतकशों का पक्ष चुना था। अपनी पत्रकारिता के जरिये वे मजदूर-मेहनतकश जनता को एकजुट करने का प्रयास करते रहे। वे उनके संघर्षों में भी सक्रिय थे।
देश के वर्तमान हालात दिनों-दिन; छात्रों-नौजवानों, मजदूरों-दलितों आदि के लिए; चुनौतीपूर्ण होतेे जा रहे हैं। ऐसे समय में शहीद भगत सिंह व उनके साथियों तथा गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत को याद करने व उनके दिखाये रास्ते पर समाज को संगठित करने की जरूरत और भी बढ़ जाती है। कौमी एकता के लिए अपने प्राणों का त्याग करने वाले गणेश शंकर ही हमारे आदर्श हो सकते हैं। भगत सिंह की क्रांतिकारी वैचारिक विरासत को आत्मसात कर ही इस चुनौतीपूर्ण समय का सामना किया जा सकता है। संघी फासीवाद को चुनौती देने के लिए भगत सिंह के आदर्शाें को अपनाना और उसका समाज में प्रचार-प्रसार ही हमारे पास एकमात्र विकल्प है। पूंजीवाद के पास मजदूरों-मेहनतकशों, छात्रों-नौजवानों को देने के लिए सिर्फ दुख और कष्ट हैं। जबकि सभी मेहनतकशों की मुक्ति समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। मजदूरों-मेहनतकशों को संगठित करने के लिए भगत सिंह ने छात्रों-नौजवानो से कहा था- ‘‘नौजवानों को क्रांति का यह संदेश देश के कोने-कोने में पहुंचाना है। फैक्ट्री-कारखानों के क्षेत्र में, गंदी बस्तियों और गांवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है, जिससे आजादी आयेगी और एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असंभव हो जायेगा।’’
आइये! भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू और गणेश शंकर विद्यार्थी के शहादत दिवस के अवसर पर उनकी क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लें। फासीवादी आंदोलन व संकटग्रस्त पूंजीवादी व्यवस्था के विरूद्ध संघर्ष का ऐलान करें व समाजवादी भारत बनाने के संघर्ष में जी-जान से जुट जाएं, पछास इस हेतु आप सभी का आहवान करता है।

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