8 मई को दो और छात्रों ने कोटा, राजस्थान में आत्महत्या कर ली। इससे 10 दिन पूर्व भी एक 17 वर्षीय छात्रा ने आई.आई.टी. में नम्बर कम आने की वजह से आत्महत्या कर ली थी। इस वर्ष विभिन्न समयों पर लगभग 8 छात्र पहले ही आत्महत्या कर चुके हैं। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 30 तक पहुंच चुका था। नौजवानों का इस तरह मौत को गले लगा लेना बेहद चिंता का विषय है। आम तौर पर आत्महत्या के लिए छात्र को ही एक मात्र दोषी समझ कर, उसके व्यक्तित्व की कमजोरी कहकर संतुष्ट हो लिया जाता है। किन्तु यदि हम उन हालातों की गहराई में जाये जिन वजहों से कोई छात्र आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहा है तो कई कोचिंग संस्थान यहां तक की यह पूंजीवादी व्यवस्था ही कटघरे में खड़ी नजर आयेगी।
कोचिंग सैन्टरों के लिए मशहूर कोटा, जहां देश से तमाम छात्र तैयारी के लिए आते हैं। भारी-भरकम पैसा इन कोचिंगों पर लुटाते हैं। लुटाये गये पैसे से कोचिंगों का तो धंधा चलता है किन्तु इस सबके बावजूद छात्र सफल हो पायेगा इसकी कोई गारंटी नहीं होती। सीटों की तुलना में प्रतिभागी हमेशा बहुत ज्यादा होते हैं। सफल के मुकाबले असफल छात्र हमेशा ही ज्यादा होते हैं। आमतौर पर आई.आई.टी. की 10 हजार सीटों के लिए लगभग 13 लाख प्रतिभागी होते हैं। 10 हजार के अतिरिक्त सभी प्रतिभागी असफल, अयोग्य घोषित कर दिए जाते हैं।
कोचिंग के लिए मोटी फीसें देने वाले अभिभावकों का दबाव भी छात्रों पर रहता है। घर, दोस्तों से दूर छात्र इस तनाव को अकेले ही झेलता है। क्योंकि इस पूंजीवादी समाज में अपनी सफलता और असफलता के लिए आप, सिर्फ आप ही जिम्मेदार होते हैं का विचार हावी रहता है। इस वजह से यह समाज छात्र को एकांगी और समाजिक सरोकारों से काटकर रख देता है। एक छात्र कड़ी मेहनत कर डाॅक्टर, इंजीनियर आदि बनना चाहता है किसलिए? समाज की भलाई के लिए? नहीं। एक पूंजीवादी इंसान की तरह उसका भी उद्देश्य पैसा, नाम कमाना होता है। ऐसे आदर्शों व विचारों में जब छात्र को असफलता हासिल होती है तो उसे पूरा जीवन ही निरर्थक लगने लगता है।
छात्र निराश होकर आत्महत्या कर रहे हैं और पूंजीवादी व्यवस्था के नेता, अधिकारी गाल बजाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं। बड़बोला प्रधानमंत्री मन की बात कर छात्रों-अभिभावकों को महात्मा के समान उपदेश देता है तो कोटा का डी.एम. एक लाख पत्र अभिभावकों को बंटवाकर उन्हें छात्रों पर दबाव न डालने का उपदेश देता है।
इनकी बातें कोरे उपदेश इसलिए हैं क्योंकि सरकार छात्रों के लिए अवसर नहीं बड़ा रही है। बल्कि दिन-प्रतिदिन छात्रों के भविष्य को अंधकार में डाल रही है। नौकरियां सीमित होने से छात्रों केे लिए प्रतियोगिता और भी खूंखार होती जा रही है। साथ ही ये प्रतियोगिता खुदगर्जी, व्यक्तिवाद को भी बड़ा रही है।
छात्रों अभिभावकों को महात्माई उपदेश देने के स्थान पर सरकार को वो करना चाहिए जो कि उसका काम है। यानि अवसरों को पैदा करना। अवसरों को पैदा करना समस्या का क्षणिक समाधान ही है। असली समाधान इस पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा है। यह पूंजीवादी व्यवस्था व्यक्ति को सामाजिक सरोकारों से काटकर उसे घोर व्यक्तिवादी बनाती है। यह व्यवस्था बेरोजगारी का खात्मा नहीं कर सकती और ना ही पूंजीवादी प्रतियोगिता का। इसलिए जरूरी हो जाता है कि हम सभी परिवर्तनकामी छात्र, छात्रों को आत्महत्या की ओर धकेल रही इस व्यवस्था पर निर्णायक चोट करने के लिए एकजुट हों।

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