3 June 2016

नीट: न्यायालय के पैबंद पर सरकार का अध्यादेश

        पिछले दिनों चिकित्सा प्रवेश परीक्षा NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम इंट्रेन्स टेस्ट) पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध मोदी सरकार अध्यादेश लेकर आयी जिस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिये। अब राज्य एम.बी.बी.एस. व दंत चिकित्सा के लिए अपनी अलग से परीक्षा करा सकते हैं। फिलहाल ये छूट इस वर्ष प्रवेश परीक्षा कराने को लेकर है। हालांकि निजी चिकित्सा संस्थानों को अपने यहां प्रवेश ‘नीट’ के द्वारा ही लेने होंगे। इसमें भी उन सीटों पर प्रवेश ‘नीट’ के द्वारा नहीं होंगे जिन सीटों को इन निजी मेडिकल काॅलेजों में राज्य के कोटे से भरा जाता है।

        दरअसल 2012 से पहले केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ए.आई.पी.एम.टी.(All India Pre Medical Test) कराता था। तत्कालीन सरकार ने यह निर्णय लिया कि देश में एक ही परीक्षा होनी चाहिए। यह परीक्षा 2012 से प्रारम्भ होनी थी परन्तु राज्य सरकारों और निजी चिकित्सा संस्थानों के विरोध के चलते केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और भारतीय चिकित्सा परिषद ने इसे एक साल के लिए टाल दिया। 
        नीट के विरोध में 80 केस फाइल किये गये। इसमें दो राज्यों की ओर से और बाकी निजी व अल्पसंख्यक संस्थानों की ओर से। इस सबके बीच 5 मई 2013 को पहली बार नीट का आयोजन किया गया। 
        8 जुलाई 2013 को नीट की वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय नीट के विरुद्ध आया। सर्वोच्च न्यायालय की इस पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश भी शामिल थे। इस निर्णय के विरुद्ध एक पुनर्विचार याचिका भारतीय चिकित्सा परिषद की ओर से अक्टूबर में दाखिल की गयी। 7 अप्रैल 2016 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णय को बदलते हुए नीट के आयोजन को वैध माना। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से दिसम्बर 2010 को सरकार के नीट के द्वारा एकीकृत प्रवेश परीक्षा का निर्णय पुनः लागू हो गया। 
        इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने दो तारीखों को नीट कराने का आदेश जारी किया। न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ 29 अप्रैल को मोदी सरकार सर्वोच्च न्यायालय के पास गयी कि वह 28 अप्रैल के अपने निर्णय में बदलाव करे और राज्य व निजी कालेजों को स्वतंत्र प्रवेश परीक्षा कराने की इजाजत दे दे। मोदी सरकार का काला धन पर पाखंड उजागर हो जाता है क्योंकि उसे निजी शिक्षा माफियाओं द्वारा कालेधन की चलायी जाने वाली अर्थव्यवस्था नजर नहीं आती और न ही मोदी के एजेंट रामदेव को। 
        सबसे मजेदार तो यह होता है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध विभिन्न राज्यों की सरकारें भाषा, पाठ्यक्रम आदि के नाम पर एकीकृत प्रवेश परीक्षा को टालना चाहती थीं। और इससे भी मजेदार यह है कि सर्वदलीय बैठक में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध अध्यादेश जारी करने पर सरकारी सहमति बन जाती है। यह दिखाता है पार्टियां निजी शिक्षा माफियाओं के हितों को और नेता स्वयं अपने हितों को (क्योंकि अनेक काॅलेज नेताओं के भी है) बचाने के लिए कैसे एकजुट हो जाते हैं। वैसे वे एक दूसरे का खूब विरोध करते हैं। दूसरा ये नेता निजी शिक्षा माफियाओं को मान्यता प्रदान करने में मदद करते हैं और इसके एवज में मोटा कमाते भी हैं। 
        जब सर्वोच्च न्यायालय ने निजी माफियाओं के अल्पसंख्यक संस्थानों व राज्यों की नीट को लेकर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया तब केन्द्र सरकार ने शिक्षा माफियाओं के दबाव में अध्यादेश लाने का फैसला लिया। अध्यादेश को लेकर 20 मार्च से ही खूब ड्रामा चला। जब कैबिनेट की बैठक में अध्यादेश पास हो गया तो देश के मूड के भांपते हुए स्वास्थ्य मंत्री 21 मई की रात को ही आकर बयान देते हैं कि नीट से ही प्रवेश होंगे व सरकार अध्यादेश नहीं ला रही है। परन्तु अंततः सरकार अध्यादेश लायी पर उसमें निजी चिकित्सा संस्थानों को स्वंतत्र प्रवेश परीक्षा कराने की छूट प्रदान नहीं की गयी थी। 
        निजी चिकित्सा संस्थानों की मजबूत लाॅबी का इससे अंदाजा लग जाता है कि वे कितनी मजबूत हैं। कहा तो यह भी जाता है कि 2013 में नीट को अवैध घोषित करने के लिए भी इस लाॅबी की ओर से करोड़ों रुपये दिये गये थे।
        इस सबके बावजूद निजी मेडिकल काॅलेजों में पढ़ाई करना आम छात्र के लिए सम्भव नहीं है। वे सभी फीस बढ़ाने के लिए तैयार बैठे हैं। पहले डोनेशन और अब महंगी फीसें इन आम छात्रों का निजी चिकित्सा संस्थानों में प्रवेश को निषिद्ध कर देती हैं। स्पष्ट ही है कि अब निजी शिक्षण संस्थान अपनी कमाई बरकरार रखने के लिए फीस बढ़ाने की ओर जायेंगे।        इस समय देश में लगभग 57000 सीटेें हैं। इनमें से लगभग 28000 सरकारी काॅलेजों में व 29000 सीटेें प्रवेश के लिए निजी चिकित्सा संस्थानों में। सरकारी काॅलेजों में लगभग 4000 सीटें केन्द्र सरकार के अधीन कालेजों में हैं व निजी चिकित्सा संस्थानों की कुल सीटों का लगभग 12-15 प्रतिशत राज्यों के कोटे के तहत है। 
        इन निजी काॅलेजों के संचालकों में विभिन्न पार्टियों के सांसद व मंत्री भी हैं। ये काॅलेज दरअसल प्रवेश परीक्षा के नाम पर फर्जीबाड़ा करते आ रहे हैं। जिस छात्र को इन काॅलेजों में प्रवेश लेना होता है। वे पहले ही अपना पैसा डोनेशन या कैपीटेशन शुल्क के नाम पर इन संस्थानों में बिचैलिए के माध्यम से दे देते हैं। जब प्रवेश परीक्षा इन संस्थानों द्वारा कराई जाती है तो उन छात्रों से ज्यादातर प्रशनों के जबावों को खाली रखवा दिया जाता है जिससे उन्हें बाद में भरकर उन छात्रों को मेरिट में ऊपर दिखाया जा सके जिनका पैसा पहले ही पहुंच चुका होता है। 
        इन निजी संस्थानों में स्नातक के लिए डोनेशन 80 लाख रुपये तक व परास्नातक के लिए 90-95 लाख रुपये तक होता है। इसी काली कमाई को बचाने के लिए ही निजी चिकित्सा संस्थानों के मालिक जिनमें एक बड़ी संख्या सांसदों, मंत्रियों की भी है- सर्वोच्च न्यायालय में पिछले 6 सालों से लगे हुए थे। ये निजी संस्थान ज्यादातर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र व केरल में हैं। इसलिए इन प्रदेशों की सरकारों की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध तुरंत लामबंदी तेज हो गयी। यहां तक कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने तो प्रधानमंत्री को इस सम्बन्ध में फोन तक कर दिया। 
        सुप्रीम कोर्ट का फैसला ठीक ऐसे वक्त पर आया जब दो दिन बाद ही एआईपीएमटी की परीक्षा होनी थी। महाराष्ट्र में सीटीई 5 मई को, कर्नाटक में 8 मई को परीक्षा होनी थी। हड़बड़ी में आये इस फैसले ने मेडिकल में प्रवेश की तैयारी कर रहे छात्रों को असमंजस में डाल दिया।
        फिलहाल सरकार के अध्यादेश से मेडिकल स्नातक की प्रवेश परीक्षा एक साल के लिए राज्यों को कराने की छूट मिली है। परास्नातक (पीजी) की परीक्षा नीट के तहत ही होगी।
        एक तरफ नीट के समर्थक हैं जो यह उम्मीद पाले हुए हैं कि इससे मेडिकल काॅलेजों में प्रवेश में होने वाली धांधली रुक जायेगी। नीट को लागू करने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यही दिया जा रहा है। समाज को काबिल डाक्टर देने के रूप में इसे पेश किया जा रहा है। इसके साथ ही यह बात भी की जा रही है कि छात्रों को भांति-भांति की प्रवेश परीक्षाओं से मुक्ति मिल जायेगी। और एक समान प्रवेश परीक्षा होने से मानक तय करने में आसानी होगी। 
        हम सब यह जानते हैं कि पूंजीवाद और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का साथ है। मेडिकल काॅलेजों में प्रवेश पाना और प्रवेश कराना आज एक बहुत बड़ा व्यवसाय है। इसके पीछे बहुत बड़े गिरोह सक्रिय हैं। जो मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं के पेपर आउट कराने के साथ फर्जी अभ्यार्थी द्वारा पेपर हल कराने तथा फर्जी तरह से या पैसा लेकर प्रवेश कराने का काम करते हैं। जाहिर सी बात है सामान्य शिक्षा की भांति ही इसमें माफिया-अफसर-राजनेताओं का गठजोड़ है। मेडिकल काॅलेजों में प्रवेश कराने में किस कदर भ्रष्टाचार कायम है यह मध्य प्रदेश की डीमेट व व्यापमं घोटाले में पूरे देश ने देखा। जहां अनेकों की हत्यायें हो चुकी हैं ताकि असली खिलाड़ी सामने न आ पायें। नीट से यह धांधलेबाजी स्थानीय स्तर के बजाय केन्द्रीय स्तर पर होने लगेगी। असल में मेडिकल काॅलेजों में प्रवेश की प्रक्रिया को केन्द्रीकृत कर देने से यह काम ज्यादा महंगा और ऊंची पहुंच वाला हो गया है। 
        एक परीक्षा होने से छात्रों को आसानी तो होगी लेकिन अगर यह परीक्षा क्षेत्रीय भाषाओं और उनके पाठ्यक्रम के अनुसार न हो तो यह उनके लिए उत्पीड़नकारी व बाहर करने का एक माध्यम हो जायेगी। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात आदि राज्यों द्वारा इसी आधार पर इसका विरोध किया गया। एक तो नीट के पेपर का पाठ्यक्रम राज्यों के पाठ्यक्रम से काफी भिन्न था दूसरा पेपर का माध्यम हिन्दी और अंग्रेजी में था। 
        दरअसल पूंजीपति वर्ग अपनी सत्ता को सुदृढ़ करने के लिए चीजों का केन्द्रीयकरण करता चला जाता है। तमाम चीजों के लिए वह  एक मानक बनाता चला जाता है। नीट के जरिये भी वह चिकित्सा शिक्षा का तथा इसमें प्रवेश के तरीके का एक मानकीकरण करना चाहता है। भारतीय पूंजीपति वर्ग, खासकर एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की चाहत है कि देश के स्तर पर तमाम अन्य चीजों की भांति चिकित्सा शिक्षा का भी मानकीकरण हो। एक उत्पीड़नकारी व्यवस्था होने के चलते पूंजीवाद के मानकीकरण व केन्द्रीकरण की प्रक्रिया भी उत्पीड़न से भरी होती है। यही कारण है कि वह तुरत-फुरत में व अचानक इसको लागू करने की चाहत पाले हुए हैं। बिना किसी पूर्व तैयारी के वह इसे लागू करना चाहता था। मानकीकरण व केन्द्रीयकरण की इस प्रक्रिया में पूंजीवाद भारत की विविधता का ख्याल नहीं रखता। भारत जैसे विशाल बहुभाषी तथा राज्यों के संघ में यह काम और भी जटिल हो जाता है। अलग-अलग भाषायें बोलने वाले तथा क्षेत्रीय असमानता का गौर किये बिना भारतीय पूंजीवाद इसे जबरन लागू करने की कोशिश करता है। एक स्वस्थ तरीका अपनाने के बजाय वह छात्रों के लिए उत्पीड़नकारी बन जाता है। 
        बहुत शोर के साथ भी बात की जा रही है कि सरकार व न्यायालय को देश के नागरिकों के स्वास्थ्य की बहुत चिंता है। लेकिन सरकारें निरन्तर स्वास्थ्य को निजी हाथों में सौंपती चली गयी हैं। सरकार द्वारा चिकित्सा सेवा पर लगातार बजट कम किया जाना, स्वास्थ्य को पीपीपी मोड पर देना आदि स्वास्थ्य सेवा को चैपट करने के तरीके हैं। स्वास्थ्य की जिम्मेवारी राज्य की जिम्मेदारी है और राज्य और उसकी सरकारें अपनी इस जिम्मेदारी को छोड़ चुकी हैं। लेकिन न तो सुप्रीम कोर्ट और न ही अन्य कोई इसको संज्ञान में नहीं लेता। और नीट के जरिये इसके समाधान की बातें कर जनता को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। 
        पूंजीवादी सत्ता में मानकीकरण कष्टों से भरा तथा उत्पीड़नकारी होता है वहीं चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की जो बातें नीट के जरिये की जा रही हैं वह इस पूंजीवादी व्यवस्था में संभव ही नहीं है। क्योंकि नवउदारीकरण के दौर में इस पूंजी ने ही मेहनतकशों से शिक्षा और स्वास्थ्य छीना है, उसको निजी हाथों में सौंपा है। स्वस्थ मानकीकरण एक स्वस्थ और व्यापक मेहनतकश आबादी की हितैषी व्यवस्था में ही संभव है। सबको शिक्षा, सबको स्वास्थ्य की एक समान व्यवस्था के लिए नीट की जरूरत नहीं बल्कि समाजवादी व्यवस्था की जरूरत है। नीट के जरिये तो उसमें कुछ पैबंद ही लगेंगे।

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