13 June 2016

अब शिक्षकों पर मोदी सरकार का हमला

        यू.जी.सी. ने 4 मई को शिक्षकों के वर्कलोड व प्रमोशन से संबंधित अपने 2010 के रेगुलेशन में कई संशोधन करते हुए एक अधिसूचना जारी की है। अधिसूचना के बाद से ही तमाम विश्वविद्यालयों के शिक्षक यू.जी.सी. द्वारा किये गये इन संशोधनों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय टीचर्स ऐशोसियेशन(डूटा) ने संघर्ष की शरूआत करते हुए डीयू में परीक्षा कापियों की जांच प्रक्रिया का बहिष्कार कर दिया हे। जामिया, जे.एन.यू.व देशभर के तमाम शिक्षक संगठनों ने डूटा का समर्थन करते हुए संघर्ष के लिए कमरकश ली है। शिक्षकों की इस लड़ाई में तमाम छात्र संगठन (ए.बी.वी.पी. को छोड़कर) भी शिक्षकों के साथ एकजुट हुए हैं।

        यू.जी.सी. द्वारा रेगूलेशन में किये गये बदलावों में सबसे बड़ा हमला शिक्षकों पर काम का बोझ बढ़ाने से संबंधित है। पुरानी प्रणाली के अनुसार शिक्षकों द्वारा पढ़ाये जाने वाले घंटों में तीन हिस्से- लेक्चर, ट्यूटोरियल, प्रेक्टिकल शामिल होते थे। जिसके तहत प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंड प्रोफेसर के लिए क्रमशः 14, 14 व 16 घंटे प्रति सप्ताह निर्धारित किये गये थे। ट्यूटोरियल्स का समय भी इन्हीं घण्टों में शामिल था। परंतु यूजीसी के नए संशोधनों में ट्यूटोरियल को इन घण्टों से अलग कर दिया गया है, साथ ही लेक्चर के घण्टों को भी बढ़ा दिया गया है। अब प्रत्येक शिक्षक के लिए 6 घण्टे प्रति सप्ताह ट्यूटोरियल्स के लिए बढ़ा दिये गए हैं। इन नए संशोधनों के हिसाब से प्रोफेसर, एसोसिएट व असिस्टेंट प्रोफेसर को प्रति सप्ताह 20, 22 व 24 घण्टे की क्लासें देनी होंगीं। इन अतिरिक्त 6 घण्टों में शिक्षको को ट्यूटोरियल्स, उपचारात्मक कक्षाएं, सेमिनार, प्रशासिनक काम आदि करने होंगे। 
        सरकारों द्वारा लम्बे समय से विश्वविद्यालयों में शिक्षकों को ठेके अथवा संविदा पर रखा जा रहा है। विश्वविद्यालयों में काम की अधिकता होने पर इन शिक्षकों को घण्टों आदि के आधार पर रखा जाता है। डीयू में ही लगभग 4000 शिक्षकों को एडहाॅक पर रखा गया है। जिनके सिर पर हमेशा ही छंटनी की तलवार लटकती रहती है। यूजीसी के नए प्रस्ताव से सबसे ज्यादा मार इन्हीं शिक्षकों पर पड़नी है। स्थायी शिक्षको पर काम का बोझ बढ़ाकर, दरअसल एडहाॅक अथवा संविदा शिक्षको द्वारा किए जा रहे काम को स्थायी शिक्षकों पर स्थानान्तरित करने की कोशिश की जा रही है। यह प्रक्रिया दो परिघटनाओं को जन्म देगी। एक, यह स्थायी शिक्षकों पर काम के बोझ को बढ़ाकर उनकी कार्यपरिस्थितियों को उत्पीड़नकारी बनाएगी। शिक्षको को केवल शिक्षण कार्य में झोंककर उनकी सामाजिक भूमिका को भी इस प्रक्रिया के जरिए कम कर दिया जायेगा। दूसरा, स्थायी शिक्षकों द्वारा ही अतिरिक्त शिक्षण कार्य कर लेने के चलते सरकार द्वारा एडहाॅक शिक्षकों (जिनको सरकार अतिरिक्त शिक्षक मानती है) की छंटनी करना आसान हो जाएगा। यही नहीं भविष्य में शिक्षण कार्य में अपना भविष्य देख रहे लाखों बेरोजगार युवाओं के सपनों को भी ये संशोधन तोड़ते हैं। इस प्रकार ये संशोधन शिक्षण कार्य में नए रोजगारों के सृजन को बाधित करेगा और बेरोजगारी की विभीषिका को और अधिक बढ़ाने का काम करेगा। डूटा अध्यक्ष नंदिया नारायण के अनुसार यूजीसी के नए संशोधनों के अनुसार डीयू में मौजूदा शिक्षकों पर लगभग 50 प्रतिशत वर्कलोड़ बढ़ जायेगा। जिससे 5000 शिक्षक सरकारों की परिभाषा के अनुसार अतिरिक्त हो जाएगें। इससे सरकार द्वारा इन अतिरिक्त शिक्षकों की छंटनी करना आसान हो जाएगा। 
        यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्राण्ट कमीशन) का मुख्य काम विश्वविद्यालयों को अनुदान उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद यूजीसी द्वारा शिक्षकों के वर्किंग आॅवर सम्बन्धित दिशा-निर्देश जारी करने के पीछे निश्चित कारण हैं। इसी साल मोदी सरकार ने यूजीसी को दिये जाने वाली राशि में 55 प्रतिशत तक की कटौती कर दी है। जहां छात्रों को इस कटौती का रूप लगातार बढ़ती फीसों, गिरते शिक्षण संसाधनों के रूप में दिखायी देता है तो शिक्षकों को काम के बोझ(वर्कलोड) में बढ़ोत्तरी के जरिए इस रूप की विभीषिका दिखायी जा रही है। 
        मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों को तेजी से आगे बढ़ाया है। इन नीतियों के तहत पूंजीपतियों के पक्ष में नीतियां बनाना, पूंजीपतियों को करोड़ों-अरबों रुपये की छूटें देना आदि शामिल है तो वहीं दूसरी तरफ सामाजिक मदों मे कटौती करना भी उसकी नीति रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा जैसी जनता के कल्याण की अन्य योजनाओं के बजट में कटौती इन्हीं नीतियों का परिणाम है। हालिया यूजीसी के संशोधनों के जरिए शिक्षकों पर हमला भी इन्हीं नीतियों का हिस्सा है। इसलिए शिक्षकों को अपनी कार्य परिस्थितियों में सुधार के लिए कोई भी संघर्ष इन नीतियों के विरोध से जुड़ जाता हैं। 
        यूजीसी के नए संशोधनों में दूसरा बड़ा हमला शिक्षकों के प्रमोशन से सम्बन्धित है। यूजीसी ने शिक्षकों के प्रमोशन से सम्बन्धित एपीआई- API(अकेडमिक परफार्मेंस इन्डीकेटर) में अपने 2010 के रेगुलेशन में भी कई बदलाव किए हैं जो शिक्षकों के प्रमोशन की प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना देगा। वैसे शिक्षक पहले से ही एपीआई के प्रस्तावों को विरोध करते रहे हैं व इन्हें बदलने की मांग करते रहे हैं। परन्तु यूजीसी ने शिक्षकों की मांगों को दरकिनार करते हुए प्रक्रिया को और अधिक कठिन बना दिया है। 
        पहले तक शिक्षकों को प्रमोशन के लिए इंटरव्यू में बुलाने से पहले कुछ संहिताओं को पूरा करना पड़ता था। जैसे- उनका शिक्षण कार्य का अनुभव, उनके द्वारा किए गए शोध आदि। परन्तु नए संशोधनों के अनुसार शिक्षकों को इंटरव्यू में शामिल होेने के योग्य होने के लिए 100 अंक अर्जित करने होंगे। इन 100 अंकों को अर्जित कर लेने के बाद ही किसी शिक्षक को प्रमोशन के लिए इंटरव्यू में बुलाया जाएगा। इन 100 अंकों का बंटवारा असिस्टेंट, एसोसिएट व प्रोफेसर के लिए भिन्न-भिन्न है। जैसे असिस्टेंट प्रो. के लिए इन 100 अंकों का बंटवारा निम्न प्रकार है- लेक्चर (60अंक), परीक्षा ड्यूटी (20 अंक), नवोन्मेषी शिक्षण (इनोवेटिव टीचिंग- 10 अंक), छात्र फीडबैक (10 अंक)। इनमें से शिक्षक लेक्चर के जरिए जो 60 अंक अर्जित करेगा, उसका मूल्यांकन पूरे वर्ष में पढ़ाए गये घण्टों से 10 को भाग देकर प्राप्त होगा। इसका मतलब शिक्षकों को एक वर्ष में 600 व सेमेस्टर में 300 घण्टे के लेक्चर देने होंगे। यह 15 सप्ताह के सेमेस्टर के हिसाब से 20 घण्टे प्रति सप्ताह बैठता है जो कि यूजीसी द्वारा लेक्चरों से सम्बन्धित जारी किए गये नए संशोधनों से भी ज्यादा है। किसी भी शिक्षक को प्रमोशन पाने के लिए 20+6 घण्टे यानी 26 घण्टे प्रति सप्ताह पढ़ाना होगा। प्रमोशन में किए गये बदलाव भी शिक्षकों की कार्यपरिस्थितियों को बदहाल ही करेगा। वहीं प्रमोशन की मजबूरियों के चलते शिक्षकों को इन्हें चुपचाप सहन करना पड़ेगा। 
        प्रमोशन सम्बन्धित बदलाव में एक नया बदलाव छात्रों के फीडबैक को शिक्षकों के प्रमोशन से जोड़कर किया गया है। कई छात्र व छात्र संगठन लम्बे समय से शिक्षकों की जवाबदेही तय करने की मांग उठाते रहे हैं। इस पर शिक्षक संगठनों की तरफ से भी कई सुझाव आते रहे हैं। इनमें से एक सुझाव- कालेज स्तर पर छात्र-शिक्षक कमेटियों को बनाने का है। जिनमें सभी छात्र जनवादी आधार पर शिक्षकों से सम्बन्धित समस्याओं को उठा सकें और इन कमेटियों के जरिए ही शिक्षकों की जवाबदेेही तय की जाए। परन्तु यूजीसी ने कभी भी इस तरह के सुझावों को आगे नहीं बढ़ाया है। इससे पता चलता है कि यूजीसी की मंशा कभी भी छात्रों का फीडबैक लेना नहीं रही बल्कि छात्रों की इस लोकप्रिय मांग को मौजूदा संशोधनों में शामिल कर वह छात्रों को इन संशोधनों के पक्ष में खड़ा करना चाहती है। वहीं इस संशोधन के जरिए वह छात्रों-शिक्षकों के बीच के अंतर्विरोध का फायदा भी उठाना चाहती है। एबीवीपी जैसे छात्र संगठनों ने इस तरह के प्रयास करने शुरू भी कर दिये हैं। ऐसे में सभी प्रगतिशील छात्र संगठनों की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है कि वह छात्रों के बीच मौजदूा सरकार व यूजीसी की शिक्षा विरोधी नीतियों तथा मौजूदा संशोधनों का भण्डाफोड़ कर, छात्रों-शिक्षकों की फौलादी एकता कायम करें।

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