बीते सोमवार को हजारों की संख्या में कश्मीरी छात्रों ने सड़कों पर उतरकर भारतीय सेना द्वारा किए जा रहे दमन के विरोध में प्रदर्शन आयोजित किए। कश्मीर में रोज ही भारतीय राजसत्ता के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं। सोमवार को हुए प्रदर्शनों की खास बात ये थी कि इसमें मुख्यतः कालेजों-स्कूलों के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। भारतीय सेना द्वारा इन प्रदर्शनों का व्यापक दमन किया गया। कालेजों में घुसकर आंसू गैस, पैलेट गन से छात्र-छात्राओं पर हमला किया गया। सेना द्वारा की गयी इस दमनात्मक कार्यवाही के बाद लगभग 60 से अधिक छात्र-छात्राएं गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। घटना के बाद से घाटी में प्राथमिक स्कूलों को छोड़कर सभी तरह के शिक्षण संस्थानों को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया है। कई कालेजों ने अपनी परिक्षाएं स्थगित कर दी हैं। तो एक बार फिर से घाटी में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयी हैं।
सोमवार के विरोध-प्रदर्शन शनिवार 15 अप्रैल को घटी घटना के विरोध में आयोजित किए गए थे। शनिवार को पुलवामा डिग्री कालेज में सेना के घुसने का विरोध करने पर सेना द्वारा छात्रों का दमन किया गया था। सेना की इस कार्यवाही में दर्जनों छात्र घायल हो गए थे। इस घटना के विरोध में ‘कश्मीर यूनीवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन’ (जोकि सरकार द्वारा बैन किया गया संगठन है) द्वारा सोमवार को विरोध-प्रदर्शन करने का आहवान किया गया था। इस आहवान पर ही हजारों कश्मीरी छात्र सोमवार को सड़को पर उतरे थे।
पिछले लम्बे समय से कश्मीर में दमन का दौर जारी है। यहां तक कि उपचुनाव के दौरान कई लोग सेना की गोलीबारी में मारे गए। चुनाव के बाद से ही कश्मीरी नौजवान भारतीय राजसत्ता के दमन की इंतहा को झेल रहे हैं। सेना द्वारा एक व्यक्ति को गाड़ी से बांधकर उसे ढाल के रूप में इस्तेमाल करने जैसी ज्यादतियों ने भी छात्रों के गुस्से को भड़काने का ही काम किया। ये गुस्सा ही सोमवार के प्रदर्शन में सड़को पर दिखाई दिया। घाटी के लगभग 10 जिलों के विभिन्न कालेजों-स्कूलों में ये प्रदर्शन आयोजित किए गए। कही इन प्रदर्शनों ने उग्र रूप धारण किया तो कही शान्तिपूर्ण तरीके से पुलवामा डिग्री कालेज में सेना द्वारा की गयी कार्यवाही का विरोध किया गया।
आजादी के बाद से ही भारतीय शासक वर्ग द्वारा कश्मीरी आवाम की आवाजों को दबाने की कोशिशें की जाती रही हैं। विभिन्न मोड़ो से गुजरता हुआ कश्मीरी आवाम का संघर्ष विभिन्न कुर्बानियों के बाद भी निरंतर जारी है। हालिया वर्षो में केन्द्र में मोदी नित भाजपा सरकार के आने के बाद से कश्मीरी आवाम पर दोतरफा हमला बोला जा रहा है। एक तरफ घाटी में आवाम की हर आवाज को बंदूक की नाल से बंद करने की कोशिशें की जा रही हैं तो शेष भारत में फासीवादी योजना के तहत आवाम के संघर्ष को बदनाम करके अंधराष्ट्रवादी माहौल बनाया जा रहा है। कश्मीरी आवाम के संघर्ष को पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित, कश्मीरी संघर्ष को पत्थराबाजों का संघर्ष घोषित करके भारतीय शासक कश्मीरी नौजवानों पर सेना द्वारा ढाए जा रहे जुल्मों को जायज ठहरा रहे हैं। इस अंधराष्ट्रवादी माहौल में ऐसे नौजवानों को तैयार किया जा रहा है जो पैलेट गन का शिकार अंधे कश्मीरियों को देखकर खुश होते है।
कश्मीर के हालातों ने साबित किया है कि भारतीय शासकों के पास सिवाए दमन के ‘कश्मीर’ का कोई हल नही है। फासीवादी भाजपा से हल की उम्मीद करना तो और भी बेईमानी है। भाजपा के साथ राज्य में गठबंधन की सरकार चला रही पीडपी भी इस दमन का बस दिखावे का विरोध कर रही है। घाटी की जनता ने इस बार चुनाव में पीडपी को मौका दिया था परंतु वक्त ने साबित कर दिया कि ये पार्टी भी कश्मीरियों की आवाज को उठाने के बजाए दमन में बीजेपी सरकार के साथ खड़ी है। दरअसल कश्मीरी आवाम का संघर्ष एक जनवादी संघर्ष है। और भारतीय राजसत्ता निरंतर निरंकुश होते हुए वहां पहुंच गयी है जहां बीजेपी के रूप में पूंजीपति वर्ग का सबसे प्रतिक्रियावादी धड़ा केन्द्र में काबिज है। फासीवादी मंसूबे पाले ये पार्टी हर तरह के जनवाद की विरोधी है। ऐसे में कश्मीर का सवाल व्यवस्था की चोहद्दियों में हल नही किया जा सकता। कश्मीरी संघर्ष को पूंजीवादी व्यवस्था की दिवारों को लांघना ही होगा।
आज कश्मीर एक बार फिर से संघर्ष की राह में खड़ा हुआ है। इस बार कश्मीर के छात्र-नौजवान इस संघर्ष में सबसे आगे खड़े हुए हैं। पछास सभी इंसाफपसंद, जनवादी, मुक्तीकामी छात्रों-नौजवानों से अपील करता है कि भारतीय राजसत्ता द्वारा कश्मीरी नौजवानों के दमन के विरोध में आवाज बुलंद करें।


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