उत्तर प्रदेश में जब योगी अपने दो माह के कार्यकाल का गुणगान करते नहीं थक रहे हैं तब प्रदेश के सहारनपुर में दलितों पर हमले हो रहे हैं। सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में 5 मई को ठाकुरों ने दलितों के 60 से ज्यादा घरों में आग लगा दी। जिसमें घर पूरी तरह जल गये। लेकिन जान का कोई नुकसान नहीं हुुआ। इसके बावजूद तनाव बना रहा और कई हिंसक झड़पे जारी रही। इसके बाद 23 मई को सहारनपुर आयी बसपा नेता मायावती की रैली से लौट रहे दलितों की कार पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया, जिसमें एक दलित युवक की मौत हो गयी।
ठाकुरों-दलितों के बीच तनाव 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती पर रविदास मंदिर में अम्बेडकर की मूर्ति लगाने का ठाकुरों द्वारा विरोध करने और प्रशासन का मूर्ति न लगाने देने से हुआ। इसके बाद सहारनपुर के ही दुधली में भाजपा सांसद राघव लखनपाल शर्मा के नेतृत्व में निकली शोभायात्रा में भी विवाद हुआ, जिसमें सांसद एफ.आई.आर. में नामजद है, लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुयी। शब्बीरपुर में 5 मई को ठाकुरों द्वारा महाराणा प्रताप की शोभा यात्रा निकाले जाने पर दलितों ने डी.जे. के इस्तेमाल पर प्रशासन को शिकायत की। जिसके बाद बिना डी.जे. के निकले जुलूस में दलित विरोधी नारेबाजी; अम्बेडकर मुर्दाबाद, राजपुताना जिन्दाबाद, महाराणा प्रताप जिन्दाबाद; के नारे लगाए गए। इसके बाद ठाकुरों द्वारा रविदास मंदिर में तोेड़फोड़ की गयी, जिस दौरान एक ठाकुर युवक की दम घुटने से मौत हो गयी। जिसे अफवाह फैलाने में माहिर लोगों द्वारा हत्या बताया गया। इस अफवाह के बाद ठाकुर इकट्ठा हुये और दलितों के घरों में आग लगा दी।
9 मई को दलितों ने घरों को हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग करते हुए गांधी पार्क, सहारनपुर में प्रदर्शन किया, जिस पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। पुलिस के पहले से ही दलित विरोधी रुख और लाठीचार्ज से आहत दलितों ने पुलिस के लाठीचार्ज का जवाब प्रति हमले से दिया। इस दौरान दलितों के बीच से बनी भीम आर्मी काफी प्रचार और प्रभाव हासिल कर चुकी थी। तब मीडिया एवं सरकार भीम आर्मी को निशाना बनाते हुए दलितों पर हमलावर हो गयी। लेकिन इस काम को चतुराई से किया गया जिससे की दलितों में भाजपा के प्रति आक्रोश को भी शांत किया जाए। प्रशासन ने पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों से क्षेत्र को घेर दिया।
संघ-भाजपा अपने सबसे स्वर्णिम दौर तक पहुंचने में मुस्लिम विरोधी भावना फैलाते हुए दलितोें को साथ में समेटने की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन संघी शिक्षाओं में हिन्दू राष्ट्र का नायक तो शुद्ध आर्य नस्ल का होगा, जो की उच्च जातियों में ही पैदा होती हैं। ऐसे में संघी शिक्षाओं से ओतप्रोत ठाकुरों से दलितों को बर्दाश्त करना मुश्किल ही है। इसका ही नतीजा है कि दलितों में शिक्षा एवं रोजगार के कारण हुयी कुछ उन्नति भी इन सवर्णों को आंख में कांच की तरह चुभती है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा बुलन्द करने वाले मोदी-योगी भी इन्हीं विचारों की पैदाइश हैं। अतः दलितों के साथ हो रही हिंसा उनकेे आचरण को नहीं बदल पाती। और वे एक सच्चे संघी की तरह ऐसे में मूकदर्शक बने रहते हैं या अपनी काली जुबान से कुछ न कुछ कहते रहते हैं। पिछले साल गुजरात के ऊना में दलितों को सरेआम पीटने पर प्रधानमंत्री मोदी मंच पर खड़े होकर रोते हैं, ‘‘मेरे दलित भाईयों को मत मारों मुझे मार लो’’। मानों कोई असहाय दीन-हीन आदमी हो, जिसकी कोई नहीं सुनने वाला। हमेशा ‘एक्शन’ में रहने वाले योगी दलितों पर हमले के बावजूद एक बार भी सहारनपुर नहीं गये। कानून व्यवस्था के नाम पर भीम आर्मी और दलितों को निशाने पर लिया जा रहा है।
मध्ययुगीनता के प्रेमी संघियों ने समाज में जातिवाद, महिला हिंसा और अन्य सामंती अवशेषों के पक्षपोषण का ही काम करना है। वे अल्पसंख्यकों, दलितों व महिलाओं के समाज में सम्मान और बराबरी के तीखे विरोधी हैं। इसीलिए कभी ये महिलाओं को तमीज सिखाने निकल पड़ते हैं तो कभी सामंती परम्पराओं के नाम पर दलितों को ऊंच-नीच का पाठ पढ़ाने लगते हैं तो कभी मुस्लिम विरोध कर ‘देशभक्ति’ का ‘सच्चा’ प्रमाण देते हैं। बल्कि समाज से भी इसीलिए लड़ते हैं कि सब अपनी ‘देशभक्ति’ का प्रमाण दें।
वहीं दलितों के ‘हितैषी’ बसपा-कांग्रेस (मायावती और राहुल सहारनपुर दौरे पर गये और चिंता व्यक्त की) सहारनपुर गये। मायावती ने जहां दलितों से कार्यक्रम के दौरान बसपा के झण्डे लगाने का आह्नान किया। उन्होंने साफ कहा कि सरकार ने उन्हें हैलिकाप्टर से न आने देकर उन्हें राजनीतिक तौर पर फायदा पहुंचाया (मायावती ऐसा न कहती तब यह होता ही)। वहीं राहुल गांधी कांग्रेस को दलितों की सच्ची हितैषी जताने में मेहनत करते रहे।
कांग्रेस-बसपा सरीखी पार्टियां कई सालों तक सत्ता में रहीं, पर जातिवाद को खत्म करने के नाम पर कुछ नहीं किया। जातिवाद से इन पूंजीवादी पार्टियों को भला क्यों दिक्कत होने लगी। बल्कि जातिवाद-साम्प्रदायिकता-अपराध आदि इनके सत्ता तक पहुंचने के सफल औजार हैं। यही कारण है कि इन पार्टियों को किनारे लगा भीम आर्मी जैसा नया संगठन अस्तित्व में आया। जातिवाद के खात्मे को भीम आर्मी जैसे आक्रामक तेवरों से सैकड़ों सालों में ही खत्म किया जा सकता है। पूंजीवादी राज्य मशीनरी जातिवाद के जरिये अपने पूंजीपरस्त शासन को लम्बे टिकाये रखना चाहती है। औपचारिक समानता का महिमामण्डन करती रहती है। जबकि लक्ष्मणपुर बाथे से लेकर हंसपुर टोलिया तक तमाम मामलों में न्यायालय न्याय नहीं दे सका।
ऐसे में जातिवाद को बनाये रखने की पक्षधर संघ-भाजपा सरीखी शक्तियों के साथ-साथ पूंजीवादी व्यवस्था को निशाने पर लिये जाने की जरूरत है। समाजवादी क्रांति समानता के छूटे इन अधूरे कामों को एक झटके में पूरा कर सकती है। इतिहास में मजदूरों के समाजवादी समाजों ने इसके बेहतर प्रमाण प्रस्तुत किये। अक्टूबर समाजवादी क्रांति ने तो राष्ट्रीयता, महिला, किसान आदि के जनवादी अधिकारों के मामले में मील का पत्थर स्थापित किया, जिसके आज तक उदाहरण दिये जाते हैं। जातिवाद सहित पूंजीवाद को इतिहास के कूड़ेदान में डालने के लिए जरूरी है कि ‘समाजवाद जिन्दाबाद’ का नारा लगाते हुए दलितों और अन्य मेहनतकशों-उत्पीड़ितों को समाजवादी क्रांति के लिए लामबन्द किया जाये।

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