30 July 2017

उधमसिंह को क्यों याद करें


        कहा जाता है वह कौम इतिहास का निर्माण नहीं कर सकती जो अपने इतिहास को भूल जाती है। भारत के इतिहास के अनमोल हिस्से में ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ी गयी लड़ाई आती है। भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में कई गौरवशाली पृष्ठ हैं। ऐसे ही पृष्ठ में शहीद उधमसिंह की जीवनगाथा है जिसे याद करने की आज सख्त जरूरत है।

        शहीद उधमसिंह की शहादत को एक लंबा अरसा बीत गया है। 31 जुलाई 1940 को उन्हें ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने फांसी दी थी।

        उधमसिंह भारत के उन हजारों-हजार लोगों में से एक थे जिन्हेें ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने राज को कायम रखने के दौरान फांसी दी थी।

        शहीद उधमसिंह भारत के उन राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों की श्रेणी में आते हैं जो समाजवाद, बोल्शेविक क्रांति से प्रेरित थे। उन्हें ब्रिटिश राज के अधिकारियों ने इसी रूप में लिया था। क्रांतिकारी उत्साह, दृढ़ता, एकनिष्ठता और बलिदान की भावना से भरपूर उधमसिंह भगतसिंह को अपना आदर्श मानते थे। उनके जीवन में भगतसिंह की छाप को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

        भारत के इतिहास में जालियांवाला बाग हत्याकांड ऐसी लोमहर्षक घटना थी जिसने भारत की जनता को ब्रिटिश राज के खिलाफ भयानक घृणा व आक्रोश से भर दिया था। जालियांवाला बाग हत्याकांड ने भारत के सम्पूर्ण जनमानस को बुरी तरह से झकझोर दिया था। हजारों-हजार छात्रों-नौजवानों की जिन्दगी को बदल दिया था। इस हत्याकांड को पंजाब प्रांत के गवर्नर माइकेल ओ’डवायर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेगीनेल्ड डायर ने अंजाम दिया था। 1000 से  अघिक निर्दोष लोग इस हत्याकांड में निर्ममतापूर्वक गोलियों से भून दिये गये। इस भयानक हत्याकांड के दिन उधमसिंह जालियांवाला बाग में ही मौजूद थे। इस हत्याकांड ने उनके जीवन को एकदम बदल दिया। वे एक साधारण मजदूर के बेटे से राष्ट्रवादी क्रांतिकारी में तब्दील होते चले गये।

        जालियांवाला बाग हत्याकांड के वे दिन क्षुब्धता और आक्रोश से भरे थे। उसी दिन उन्होंने क्रूर ब्रिटिश अधिकारियों से प्रतिरोध लेने का फैसला व संकल्प ले लिया था। वे अंदर से आग और बाहर से बर्फ बन गये थे।

        उधमसिंह जालियांवाला बाग हत्याकांड के बाद, पहले ‘गदर पार्टी’ और फिर भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद के संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन’ के सम्पर्क में आये। वे 1920 में अफ्रीका होते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंच गये थे। भगतसिंह के कहने पर वे कुछ साथियों व हथियारों के साथ जुलाई 1927 में भारत आये। परंतु भारत में वे दो माह के भीतर ही गिरफ्तार कर लिये गये और फिर उन्हें करीब 4 साल जेल में काटने पड़े।

        उधमसिंह जिस वक्त जेल में थे उस समय भगतसिंह और उनके साथियों की गतिविघियां चरम पर थीं। 23 मार्च 1931 को भगतसिंह, राजगुरू व सुखदेव को फांसी दे दी गयी।

        उधमसिंह जेल से छूटने के बाद अपने पैतृक गांव लौटे परंतु ब्रिटिश पुलिस ने उन का घोर उत्पीड़न जारी रखा। 1931 में वे अमृतसर आ गये। अमृतसर में उन्होंने अपना नाम उघमसिंह से बदलकर ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ रख लिया।

        उधमसिंह एक मजदूर के बेटे थे और उसी के अनुरूप उनका जीवन बीता। वे अच्छे बढ़ई, पेन्टर और मोटर मैकेनिक थे। इन्हीं पेशों के जरिये उन्होंने अपना जीवनयापन किया था। देश-विदेश की यात्राएं की थीं। उन्होंने अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, आस्ट्रिया, फ्रांस, स्विटजरलैंड आदि देशों की यात्राएं की थीं। ब्रिटेन में तो उन्हें अपने मकसद को पूरा करने के लिए जाना ही था और वहां जाने का अवसर भारी कवायद के बाद हासिल हुआ था।

        उधमसिंह की अपने मकसद के प्रति एकनिष्ठता विशेष तौर पर काबिले गौर है। उनके इरादों का फौलादीपन अनुकरणीय है। आज हमारे देश को ऐसे ही हजारों-हजार नौजवानों की जरूरत है जो भारत को बदलने के उधमसिंह जैसी एकनिष्ठता और इरादों में फौलादीपन दिखायें।

        ब्रिटेन में अपने प्रयास के दौरान वे इण्डियन वर्कर्स एसोसिएशन के सदस्य बने। अपने ब्रिटिश प्रवास के दौरान उधमसिंह उस मौके की तलाश में थे जब वे अपने मकसद को हासिल कर सके।

        उधमसिंह जिस वक्त भारत में जेल में कैद थे उस समय उस ब्रिगेडियर-जनरल रेगीनेल्ड डायर की मृत्यु लंबी बीमारी के बाद लकवा पड़ जाने से हो गयी थी। इसका उधमसिंह को बेहद अफसोस था कि एक अपराधी बिना उचित सजा पाये बगैर ही मृत्यु को प्राप्त हो गया था। परंतु मुख्य अपराधी और जनरल डायर के हाथों जालियांवाला बाग हत्याकांड रचाने वाला पंजाब का गवर्नर माइकेल ओ’डवायर अभी भी जिन्दा था।

        माइकेल ओ’डवायर को अपने कुकृत्यों का कोई अफसोस नहीं था। उसे ब्रिटेन की सरकार और शासक वर्ग से बेहद प्रशंसा और सम्मान प्राप्त हुआ। इसके साथ-साथ उसे उपनिवेशों में शासन और व्यवस्था कायम करने का विशेषज्ञ मान लिया गया था। वह रिटायर होने के बाद ब्रिटेन में जगह-जगह व्याख्यान देता फिरता था।

        ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने इस समय भारत सहित अपने तमाम उपनिवेशों में कहर बरपाया हुआ था। यही हाल फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, जापान आदि साम्राज्यवादी देशों का था। दुनिया के सभी औपनिवेशिक देशों में वहां की जनता अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रही थी और एक से बढ़कर एक कुर्बानियां दे रही थी।

        साम्राज्यवादी देशों के बीच दूसरा विश्वयुद्ध 1939 में छिड़ चुका था। साम्राज्यवादी देश दुनिया के पुर्नबंटवारे की लड़ाई लड़ रहे थे। जर्मनी, इटली, जापान एक ओर थे तो अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस जैसे दूसरी ओर। जर्मनी इटली व जापान में फांसीवादी सत्तायें कायम थीं और वे ब्रिटेन व फ्रांस से बढ़कर दुनिया में कत्लेआम मचा रहे थे।

        उधमसिंह के यौवन काल में ही दुनिया में एक देश ऐसा भी था जहां मजदूरों का राज था। बोल्शेविकों के नेतृत्व में कायम सोवियत संघ पूरी दुनिया के मजदूरों, नौजवानों को प्रेरणा दे रहा था। रूस में 1917 में अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ का जन्म हुआ। सोवियत संघ उस वक्त दिन दूनी रात चैगुनी प्रगति कर रहा था जब दुनिया महामंदी की चपेट में थी। 

        उधमसिंह के आदर्श भगतसिंह बोल्शेविक क्रांति से बेहद प्रभावित थे। बोल्शेविक क्रांति के प्रभाव में आकर ही भगतसिंह और उनके साथियों ने अपने संगठन का नाम ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी’ से ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ रख लिया था। भगतसिंह ने समाजवादी क्रांति के लिए मजदूरों, किसानों, नौजवानों का आह्वान किया था। 23 मार्च 1931 को फांसी पर चढ़ाये जाने के लगभग डेढ़ माह पूर्व 2 फरवरी, 1931 को ‘नौजवान राजनैतिक कार्यकर्ताओं के नाम एक पत्र’ में उन्होंने भारत में समाजवादी क्रांति की आवश्यकता पर जोर दिया था। भगतसिंह का आजाद भारत का सपना समाजवादी भारत का था। 

        उधमसिंह के विचारों में यद्यपि शहीद भगतसिंह की तरह की वैज्ञानिकता, परिपक्वता और तीक्ष्णता नहीं दिखायी देती है परन्तु वे उन्हीं आदर्शों से अभिप्रेरित थे जिनसे भगतसिंह थे। उधमसिंह भगतसिंह से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने जब माइकेल ओ’डवायर को उसकी करनी की सजा दी तो वे उस स्थल से भागे नहीं बल्कि उन्होंने उस स्थल में भी और बाद में अदालत में भी अपने इस राजनैतिक हत्या की कार्यवाही को उचित ठहराया। वे अपने आदर्श की तरह जीये और उन्हीं की तरह, उन्हीं के अंदाज में मौत को गले लगाया। 

        उधमसिंह  चिंतक, विचारक या सिद्धान्तवेत्ता नहीं थे। वे मूलतः कामों को अंजाम देने में विश्वास करने वाले व्यक्ति थे। अंग्रेजी में कहा जाए तो वे ‘मैन आॅफ एक्शन’ थे। 

        उधमसिंह का जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को पंजाब के संगरूर जिले की सुनाम तहसील के शाहपुर कलां गांव में हुआ था। उनके पिता सरदार तेहल सिंह जम्मू एक दरिद्र किसान थे जो बाद में रेलवे में चैकीदार बन गये थे। उधमसिंह के एक बड़े भाई थे जिनका नाम मुक्ता सिंह था। 

        उधमसिंह का बचपन बेहद दरिद्रता, अभाव व मुश्किलों में गुजरा था। जब वे अभी दो वर्ष के ही थे कि उनकी माता का देहान्त हो गया। पिता भी शीघ्र ही चल बसे। पिता की मृत्यु के समय उधमसिंह मात्र आठ वर्ष के थे। 

        उनके बड़े भाई और उनकी परवरिश इसके बाद अमृतसर के एक अनाथालय में हुयी जिसका प्रबंधन एक सिख संस्था द्वारा किया जाता था। 

       उधमसिंह के बड़े भाई मुक्ता सिंह की भी बहुत जल्दी ही मृत्यु हो गयी। मुक्ता सिंह 1917 में चल बसे। उधमसिंह इस तरह से दुनिया में निपट अकेले हो गये। उन्होंने विवाह भी नहीं किया। 

        भारत जिस वक्त गुलाम था उस समय भारत के मजदूरों, किसानों का जीवन बेहद कठिन था। आये दिन ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की नीतियों के कारण अकाल पड़ा करते थे। ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की नीति भारत को लूटने-खसोटने और किसी भी तरह अपने शासन को कायम रखने की थी। क्रूरता की सारी हदें वे आये दिन पार करते रहते थे। भारत के सामन्त, जमींदार, भ्रष्ट अफसर, सूदखोर, दलाल, लालची व्यापारी भारत के किसानों को अंग्रेजों के साथ बेरहमी पूर्वक दोहन करते थे। भारत की जनता साम्राज्यवाद और सामन्तवाद के जुए तले पिस रही थी। 

        अपने शासन को कायम रखने के लिए ही ब्रिटिश शासकों ने जालियांवाला बाग काण्ड रचा था। यह काण्ड भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा ढहाये जुल्म का एक प्रतीक बन गया। वैेसे तो अंग्रेजों ने पूरे भारत में ही ऐसे अनेक हत्याकाण्ड अपने लगभग दो सौ साल के शासन काल में रचे थे। 

        अपने शासन काल को कायम रखने के लिए उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का बखूबी इस्तेमाल किया। भारतीय जनता के बीच साम्प्रदायिक फूट डालने के लिए उन्होंने एक से बढ़कर एक घृणित हथकण्डे अपनाये। अंग्रेजों के आने के पूर्व भारत में दंगों की कोई मिसाल नहीं मिलती। हिन्दू-मुस्लिम राजा हुआ करते थे और इन राजाओं के मंत्री, सेनापति अक्सर दूसरे धर्म के हुआ करते थे। यह बात अकबर के लिए भी सही है तो मुगलों से लड़ने वाले शिवाजी के लिए भी। 

        1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारत की जनता खासकर किसानों और सिपाहियों ने एकजुट होकर लड़ाई लड़ी थी। उत्तर भारत से एक समय के लिए अंग्रेजों का पत्ता साफ हो गया था। इस लड़ाई में यद्यपि भारतीय हार गये परन्तु इसने हजारों हजार नये रणबांकुरों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। 

        1857 के बाद अंग्रेजों ने बहुत कुटिल ढंग से भारत के विभिन्न सम्प्रदायों के बीच नफरत के बीज बोये। इस काम में उनका सहयोग इन धर्मों- सम्प्रदायों के शातिर कट्टरपंथियों ने किया। 1870 के आस-पास से भारत में साम्प्रदायिक दंगों की शुरूवात होने लगी और ये दंगे बाद के काल में बार-बार भड़काये जाने लगे। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे संगठन बीसवीं सदी के दूसरे दशक से सामने आने लगे। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और इन साम्प्रदायिक संगठनों के करतूत ने भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के रूप में चरम अभिव्यक्ति पायी। 1947 में लाखों लोग दंगों के भेंट चढ़े और लाखों लोग बेघर बार हो गये। 

        1931 में उधमसिंह जब जेल से बाहर आये तब उन्हें पुलिस अत्याचार के साथ भारतीय समाज में फैले घृणित साम्प्रदायिक तनाव का तीखा अनुभव हुआ। वे भारत की जनता की एकता के प्रबल पक्षधर थे। वे चाहते थे कौमी एकता कायम हो और अंग्रेजों को भारत से खदेड़ा जाए। यही सब शायद उनके नाम बदलने की वजह बना। उन्होंने अपना नाम उधमसिंह से बदलकर ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ कर लिया। यानी एक ऐसा नाम जो कौमी एकता को व्यक्त करे। यह उनका अपना तरीका था जिससे वे कौमी एकता का संदेश देना चाहते थे। आज जब उन्हें सिक्ख धर्म अथवा उनकी जाति कम्बोज के आधार पर याद किया जाता है या फिर धर्म या जाति का नायक महानायक घोषित किया जाता है तो लगता है ऐसा करने वाले उधमसिंह के जीवन या कृतत्व को या तो लेश मात्र भी समझते नहीं हैं या फिर वे जानबूझकर ऐसा करते हैं। 

        उधमसिंह को जाति या धर्म के आधार पर देखना ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के घृणित एजेण्डे को ही आगे बढ़ाना है। अंग्रेजों के जाने के बाद वास्तव में भारत के नये शासकों ने ऐसा किया भी। आज भी ऐसी घृणित नीतियां व कारनामे जारी हैं। अंग्रेजों के द्वारा बोया गया साम्प्रदायिकता का विष वृक्ष आज भी मौजूद है। घृणित साम्प्रदायिक शक्तियां आज भी समाज को बांट रही है। उधम सिंह की शहादत और विरासत हमसे ऐसी ताकतों से लड़ने व परास्त करने का आह्वान करती है। पूरे देश में हर वर्ष सैकड़ों साम्प्र्रदायिक तनाव व दंगों की घटनाएं घटती हैं। आम तौर पर ही दंगे स्वतः स्फूर्त ढंग से न होकर पूर्ण नियोजित व प्रायोजित हो रहे हैं। उघमसिंह को सच्चे अर्थों में याद करने वालों को कौमी एकता के लिए बहुत-बहुत काम करने की जरूरत है। यह बहुत जरूरी है कि उधमसिंह की जो धार्मिक या जातीय छवि बनायी जा रही है उसके स्थान पर उधमसिंह को उस रूप में स्थापित किया जाए जैसे वे वास्तव में थे। 

        एक दूसरी प्रवृत्ति आज हमारे समाज में यह प्रचलित है कि शहीदों को देवत्व प्रदान कर दिया जाए, उन्हें देवताओं के रूप में स्थापित कर दिया जाए। भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, उघमसिंह आदि, आदि के साथ ऐसा ही किया जा रहा है। उन्हें अतिमानव बताया जा रहा है। जबकि सच यह है कि चाहे भगतसिंह हों अथवा उधमसिंह अपने युग की पैदाइश थे। वे राष्ट्रीय आजादी के लिए चल रहे देशव्यापी संघर्ष की उपज थे। भगतसिंह के विचारों में देश-दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलन खासकर दुनिया के महान क्रांतिकारी लेनिन के विचारों का व्यापक प्रभाव था। उधमसिंह का जीवन भी राष्ट्रीय आजादी के संघर्ष और दुनिया में चल रहे मजदूरों के समाजवादी आंदोलन के बीच बीता था। अतः वे उन हजारों-हजार लोगों में एक थे जो भारत की आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। और एक ऐसे भारत की रचना करना चाहते थे जो शोषण-उत्पीड़न से मुक्त हो। आज हमारे देश के मजदूरों, किसानों व नौजवानों के सामने यह कार्यभार मौजूद है कि वे एक ऐसे देश का निर्माण करें जो शोषण, उत्पीड़न से मुक्त हो। पूंजीवादी समाज को खत्म कर समाजवादी समाज की स्थापना की आवश्यकता है। 

        उधमसिंह के द्वारा माइकेल ओ’डवायर की हत्या की उस समय कई लोगों ने खासकर गांधी जी ने आलोचना की थी। हालांकि कई अन्य राष्ट्रीय नेताओं खासकर सुभाष चन्द्र बोस ने प्रशंसा की थी। सवाल उठता है इसे किस रूप में देखा जाना चाहिए। 

        उधम सिंह के इस कदम का इस रूप में महत्व है कि उन्होंने एक देश के निर्दोष नागरिकों की हत्या करवाने वाले व्यक्ति, औपनिवेशिक शक्ति ब्रिटेन को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया। ‘सठे शाठ्यम समाचरेत’ यानी दुष्टों के साथ दुष्ट जैसा ही व्यवहार किया। राष्ट्रीय आजादी की लड़ाई में भारत सहित पूरी दुनिया के इतिहास में एक ऐसा युग रहा है जब राष्ट्रीय क्रांतिकारी आतताइयों से व्यक्ति या एक छोटे समूह के रूप में बदला लेते थे। वे ऐसे दुष्ट व्यक्तियों या शीर्ष पर बैठे शासकों की हत्या करके उनके बीच आतंक कायम कर देते थे। भारत में चापेकर बंधुओं से लेकर उधमसिंह तक राष्ट्रवादी-क्रांतिकारियों की एक धारा रही है जो इसी तरह से ब्रिटिश शासकों को सबक सिखलाना चाहते थे। भगतसिंह के जीवन का भी एक समय ऐसा ही बीता था। बाद में उन्हें ऐसे कामों की निरर्थकता का एहसास हुआ तब उन्होंने बोल्वेशिक क्रांति की तर्ज पर क्रांति का आह्वान किया। उन्होंने नौजवानों, राजनैतिक कार्यकर्ताओं से कहा कि वे मजदूरों, किसानों को संगठित करें। भगतसिंह विश्व इतिहास के अध्ययन से इस नतीजे पर पहुंच गये थे कि क्रांति का अगुआ मजदूर वर्ग ही हो सकता है। किसान, मध्यम वर्ग आदि इस क्रांति में मजदूर वर्ग के कंधे से कंधा मिलाकर अपनी मुक्ति हासिल करेंगे। वे राष्ट्रीय आजादी और समाजवाद के निर्माण के कार्य को एक साथ अंजाम देना चाहते थे। 

        उधमसिंह ने माइकेल ओ’डवायर की हत्या करके ब्रिटिश शासकों को बतला दिया था कि वे अब अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। जिस कौम को उन्होंने गुलाम बनाया है, वह अब उन्हें उनके सुरक्षित व हथियारबंद किलों में भी गुलाम बनाने की सजा देने का माद्दा रखती है। 

        माइकेल ओ’डवायर की ब्रिटेन में हुयी हत्या से ब्रिटिश शासक इस कदर बौखला गये थे कि उन्होंने उधमसिंह को अदालत में अपना बयान तक नहीं देने दिया था। उधमसिंह का मुकदमा जिस जज की अदालत में चल रहा था वह उधमसिंह के बोलते ही कहने लगा कि उसे कोई राजनैतिक भाषण नहीं सुनना है और उसने मारे गुस्से के प्रेस को आदेश दिया कि वे प्रेस में उधमसिंह के वक्तव्य को न छापें। उधमसिंह का वक्तव्य में उस हर बात का जबाव था जिसका ढिंढोरा ब्रिटिश साम्राज्यवादी पीटते थे। उन्होंने एकदम ठीक कहा था,‘‘मैं भारत में ब्रिटिश राज का खात्मा चाहता हूं। आपका कहना है भारत में शांति नहीं। मैं कहता हूं भारत को आपने गुलाम बना रखा है। आपने हमारी संस्कृति और इतिहास का विनाश किया है। पूरी मानव जाति पर आपका शासन कलंक है। अगर आपमें जरा भी मानव जाति के प्रति प्रेम है तो आपको शर्म से मर जाना चाहिए। हत्याएं करके, खून बहाकर शासन प्राप्त करना और अपने को बुद्धिमान कहना तथा साथ अपने आपको सभ्यता का शासक कहना, संसार में इस गंदे रक्त की कोई जाति नहीं है।’’ 

        उधमसिंह ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के न्याय की पोल खोलकर रख दी थी। उनके मुकदमे का निस्तारण शीघ्र हो इसके लिए उन्होंने 42 दिन की लम्बी भूख हड़ताल की। उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को ओ’डवायर की हत्या की थी। लगभग चार माह में उनके मुकदमे पर फैसला सुनाकर 31 जुलाई, 1940 को उन्हें लंदन की पेटविले जेल में फांसी दे दी गयी। 

उधमसिंह के पसंदीदा शायर रामप्रसाद बिस्मिल थे। बिस्मिल ने जो उस वक्त कहा था, व आज भी मौंजू है, 

‘‘कौम पर कुर्बान होना सीख लो ऐ हिन्दयो!
जिन्दगी का राजे-मुज्मिर-खंजरे-कातिल में है।
साहिले-मकसूद पर ले चल खुदारा नाखुदा!
आज हिन्दुस्तान की कश्ती बड़ी मुश्किल में है!’’

उधमसिंह की शहादत को याद करते हुए हमें तीन सबक याद रखने की जरूरत है,

पहला, भारत में कौमी एकता को खण्डित करने वाले साम्प्रदायिक, उपद्रवी, फासिस्ट व कट्टरपंथी तत्वों की साजिशों का भण्ड़ाफोड़ किया जाए। भारत के मजदूरों, किसानों, उत्पीड़ित तबकों, समुदायों का हित इस बात में है कि देश की कौमी एकता कायम रहे। धर्मनिरेपक्ष, वैज्ञानिक व जनवादी मूल्यों का प्रसार हो। धार्मिक कूपमण्डूकता, मध्ययुगीन कट्टरपंथी सामंती मूल्य समाप्त हों। शासक वर्ग की पांतों में शामिल राजनैतिक खासकर हिन्दू फासिस्ट तत्वों के देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और अपने घृणित मंसूबों को हासिल करने के लिए की जाने वाली कार्यवाहियों का खुलकर विरोध हो। आजादी की लड़ाई के शहीदों को याद किया जाए और उनकी विरासत को आगे बढ़ाया जाए। 

दूसरा, साम्राज्यवाद आज पूरी दुनिया खासकर एशिया, अफ्रीका महाद्वीप में बेहद आक्रामक भूमिका में है। अफगानिस्तान, इराक, सोमालिया, लीबिया, सीरिया, माली जैसे देशों में वह कहर बरपा रहा है। खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद जोकि पूरी दुनिया में अपने सैन्य अड्डे कायम किया हुआ, बेहद खतरनाक व आक्रामक भूमिका में है। उसका सैन्य खर्च बहुत-बहुत ज्यादा  है। अमेरिकी साम्राज्यवाद अन्य साम्राज्यवादी देशों के साथ सांठगांठ करता रहता है और रूस को छोड़कर शेष साम्राज्यवादी आज उसके बगलगीर हैं। रूस सोवियत संघ के पतन के बाद अब पुनः सक्रिय है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवाद के द्वारा थोपे गये युद्धों में दूसरे विश्व युद्ध से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। भारत को साम्राज्यवाद ने नये किस्म का उपनिवेश आर्थिक नव उपनिवेश बनाया हुआ है। भारत के प्राकृतिक संसाधनों, बाजार सहित भारत के मजदूरों की श्रम शक्ति का बेतहाशा दोहन व शोषण किया जा रहा है। साम्राज्यवादी देशों की कम्पनियों की घुसपैठ भारतीय जीवन के हर क्षेत्र में गहरे तक हो चुकी है। भारत का पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवाद का कनिष्ठ साझेदार बन भारत के शोषण-उत्पीड़न में लगा हुआ है। वही भारत में साम्राज्यवाद का सामाजिक आधार है। ऐसे में साम्राज्यवाद को निशाने पर लेने का अर्थ भारतीय पूंजीवाद पर निशाना साघना ही मुख्य तौर पर बन जाता है। यह कार्य भारत के मजदूरों, किसानों, नौजवानों और उत्पीड़ित स्त्रियों, राष्ट्रीयताओं, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों के बगैर जागे व संगठित हुए नहीं हो सकता है। 

तीसरा, भारतीय समाज आज मूलतः एक पूंजीवादी समाज बन गया है। पूंजीवाद भारतीय समाज के रंध्र-रंध्र में प्रवेश कर चुका है। भारतीय समाज में पूंजीवाद के कारण आजादी के बाद से अब तक कई बड़े परिवर्तन आ चुके हैं। किसी समय का किसान प्रधान देश आज मजदूर प्रधान देश बन गया है। मजदूर वर्ग दुनिया में एक ऐसा वर्ग है जो समाज में परिवर्तन लाने की सबसे बड़ी, स्थायी व क्रांतिकारी शक्ति है। भारतीय समाज की सभी समस्याओं की जड़ में पूंजीवादी व्यवस्था और उसको चलाने वाला पूूंजीपति वर्ग है। वर्तमान व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन की जिस आवश्यकता को अपने युग में शहीद भगतसिंह ने रेखांकित किया था, वही आज हमारे समाज की आवश्यकता है। पूंजीवादी समाज का विकल्प समाजवादी समाज है। पूंजीपति वर्ग के शासन का जवाब मजदूर-किसानों का राज है। पूंजीवादी समाज का खात्मा और समाजवादी समाज की स्थापना ही आज के भारतीय समाज की बुनियादी समस्याओं के समाधान का रास्ता है। यही पिछले सात वर्षों से दुनिया में छायी विश्व आर्थिक संकट का भी सबक है। 

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