28 April 2018

कठुआ, उन्नाव गैंगरेप और झलकती संघी महिला विरोधी मानसिकता




        पिछले दिनों उन्नाव में भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर, उसके भाई व अन्य पर सामूहिक बलात्कार का मामला प्रकाश में आया। मामला पिछले साल जून,2017 का था। जो तब प्रकाश में आया जब पीड़िता ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने आत्मदाह करने का प्रयास किया। तब मामले ने और जोर पकड़ा जब पीड़िता के पिता को ही पुलिस ने उल्टा गिरफ्तार कर लिया तथा पुलिस कस्टडी में ही उसके पिता की हत्या कर दी गयी। 

        इसी दौरान जम्मू के कठुआ जिले में भी नाबालिग 8 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार का मामला सामने आया। यहां बलात्कारियों के समर्थन में संघियों ने प्रदर्शन तक आयोजित कर दिये। शुरु से ही संघियों ने इस मामले को हिन्दू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश की। 

        इस बीच कई अन्य जगहों पर भी ऐसे बलात्कार के मामले सामने आये जिसमें संघी शिक्षा लिये हुये ‘हिन्दू’ बलात्कार के आरोपी थे।
        मोदी से लेकर योगी तक ने मामले में अन्त तक चुप्पी बनाये रखी। बहुत दबाव पड़ने पर ही मोदी ने दुःख प्रकट किया। अन्ततः कानून की सख्ती में जाकर मामले को समेटते हुये अपनी तरफ से इतिश्री कर ली गई। 

        वहीं भाजपा के संघी शिक्षा प्राप्त विधायकों, सांसदों, मंत्रियों के महिला विरोधी विवादित बयान भी आते रहे। केन्द्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार से लेकर तमिलनाडु से भाजपा सांसद एस.वी.शेखर तक अपनी महिला विरोधी मानसिकता को छुपा न सके। 

        यहां इतना कह देना और जरूरी है कि समय-समय पर अन्य पार्टियों के नेताओं कि भी महिला विरोधी मानसिकता जाहिर होती रहती है। परन्तु भाजपा के नेताओं के बारे में बात करना इसलिए जरूरी है कि ये अपने को भारतीय संस्कृति का रक्षक, सबसे शुद्ध पार्टी, भ्रष्टाचार मुक्त पार्टी आदि तमगों से नवाजते रहते हैं और अन्य को भी ‘सर्टिफिकेट’ देते रहते हैं।
        जम्मू में बलात्कारियों के समर्थन में शर्मनाक प्रदर्शन से लेकर नेताओं की महिला विरोधी टिप्पणियों से साफ जाहिर होता है कि इन संस्कृति के ‘संस्कारी रक्षकों’ की मानसिकता कैसी है। दरअसल ये संघी, प्रतिक्रियावादी सामंती, पितृसत्तात्मक विचारों से शिक्षित हुये हैं और अपने इन्हीं विचारों को समाज में प्रचारित करते रहते हैं। जिसके अनुसार महिला, देवी, घर की इज्जत, गऊ, घर संभालने वाली, सबकी सेवा करने वाली, पतिव्रता, आदि है, बस पुरुषों के साथ बराबरी रखने वाली इंसान नहीं है।
        इसी तरह आधुनिकता के नाम पर पूंजीवादी बाजार संस्कृति ने महिलाओं को यौन वस्तु के रूप में ही पेश किया है। पितृसत्तात्मक सामंती संस्कृति और पूंजीवादी बाजार या उपभोक्तावादी संस्कृति ने महिलाओं के लिए समाज को पहले कभी की तुलना में अधिक असुरक्षित बना दिया है। जिस कारण बच्ची से लेकर बूढ़ी महिला तक सब यौन हिंसा की शिकार होने को अभिशप्त हैं। 

        यदि आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि साल 2017 में बलात्कार के कुल 38,947 मामले हुए। इनमें से लगभग 43.2 प्रतिशत मामले नाबालिग बच्चियों के साथ हुए हैं। इसी तरह बलात्कार की कुल घटनाओं में 94.6 प्रतिशत मामलों को अंजाम देने वाले पीड़िता के परिचित होते हैं। साल 2016 के अंत में पुलिस के पास 4,97,482 बलात्कार के मामलों की जांच विलम्बित (पेन्डिंग) थे। आंकड़े बताते हैं कि अपराध से महिलायें घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं, महिलायें ही नहीं बल्कि बच्चियां तक सुरक्षित नहीं हैं। 

        अतः हमारी यह साफ समझ है कि महिला हिंसा के खिलाफ कानूनी सख्ती से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, जैसा कि अभी तक भी नहीं पड़ा है। महिला हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी है कि सामंती पितृसत्तात्मक संस्कृति और पूंजीवादी उपभोक्तावादी संस्कृति का जड़-मूल से नाश हो। पर अपने मुनाफे और व्यवस्था को बचाने के लिए मौजूदा सरकार या पूरी व्यवस्था ही ऐसा नहीं करना चाहती है और न ही कर सकती है। अतः महिलाओं की समाज में पूर्ण बराबरी और सम्मान के लिए इस मुनाफा केन्द्रित पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना आवश्यक व प्रमुख कार्यभार बनता है। 

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