ए.एम.यू. में 2 मई उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गये थे, इस दौरान हिन्दू युवा वाहिनी आर.एस.एस., ए.बी.वी.पी. के लम्पटों ने हथियारों के साथ हमला किया जिसमें कई छात्र घायल हो गए और हामिद अंसारी को कार्यक्रम रद्द कर वहां से जाना पड़ा। एक आतंक का माहौल वहां बना दिया गया। पुलिस मूकदर्शक बनी रही और लाठियां मारी भी तो उन छात्रों को जो इन भगवाधारी लम्पटों की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे। पुलिस साफ तौर पर भगवा सरकार के लम्पटों की सेवा में लगी थी।
भाजपा के स्थानीय सांसद और अन्य साथियों ने ए.एम.यू. छात्र संघ हाॅल में जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग को लेकर सारा आतंक कायम किया। इससे पहले भी माहौल बिगाड़ने की मंशा से यूनिवर्सिटी में संघ शाखा लगाने की मांग की गई। बल्कि 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही ए.एम.यू. पर कभी पाकिस्तान परस्त होने, आई.एस. के आंतकी पैदा करने, कश्मीरी आत्मनिर्यण के समर्थक होने आदि के नाम पर निशाना साधा गया। यह आरोप जहां ए.एम.यू. को तो निशाना बनाते ही हैं वहीं दूसरी ओर देश में मुस्लिम विरोधी माहौल बनाने, चुनावी लाभ के लिए हिन्दुओं के धु्रवीकरण आदि के मकसद से भी किए गये।
हालिया जिन्ना की तस्वीर हटाने के मामले को भी मुस्लिम विरोधी माहौल, कर्नाटक चुनाव आदि से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिये। प्रतीकों की राजनीति का यह अकेला मामला नहीं है। जिन्ना की तस्वीर हटाने, त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़ने, अम्बेडकर, पेरियार की मूर्ति तोड़ने, तिरंगे झण्डे, राष्ट्रगान आदि प्रतीकों की राजनीति से अपने फासीवादी विचारों का यह हिन्दू फासीवादी प्रचार करते हैं। गोदी मीडिया भी गला फाड़कर इसका प्रचार करता है, ए.एम.यू. में गुण्डागर्दी करते लम्पटों के बजाय चैनल जिन्ना की तस्वीर पर बहस करवाते रहे और मुस्लिम विरोधी हिन्दू फासीवादी विचारों को बढ़ाते रहे।
जिन्ना की तस्वीर के विरोधी इस बात से बचने की कोशिश करते हैं कि जब जिन्ना देश के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता थे या बाद में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में लगे थे तब आर.एस.एस., हिन्दू महासभा अंगे्रजों के चाटुकार बने हुए थे। सावरकर से लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक स्वतंत्रता आंदोलन से गद्दारी कर स्वतंत्रता सैनानियों या क्रांतिकारियों को फंसा रहे थे और अंगे्रजों की मदद कर रहे थे। स्वतंत्रता आंदोलन के गद्दार आज 'राष्ट्रवादी' बनकर देश को बर्बाद कर रहे हैं।
जिन्ना कौन थे? जिन्ना भारतीय पूंजीपति वर्ग के वैसे ही नेता थे जैसे नेहरू, गांधी या बाकी और थे। जिन्ना भारतीय मुस्लिम पूंजीपतियों का प्रतिनिधित्व करते थे। चूंकि आजादी के आंदोलन में पूंजीपति भी अपने हित देखते थे इसलिए वे इसमें मदद कर रहे थे पर अपने हितों के हिसाब से अपनी भूमिका पीछे भी बढ़ाते रहते थे। अपने विचारों में धर्मनिरपेक्ष जिन्ना पूंजीपतियों के छुद्र हितों के लिए ही साम्प्रदायिक व विभाजनकारी कदमों के हिमायती भी थे। देश विभाजन के लिए जिन्ना उतने ही दोषी हैं जितना गांधी, नेहरू, या अन्य।
1939 में ए.एम.यू ने जिन्ना को आजीवन सदस्यता दी और अन्य आजीवन सदस्यों की तरह उनकी तस्वीर भी छात्र संघ भवन में लगाई। ए.एम.यू. की स्थापना सर सैयद अहमद खां ने 1875 में मोहम्मदन एंग्लो ओरियन्टल काॅलेज के नाम से की। इस काॅलेज की स्थापना में राजा जय किशन ने विशेष सहयोग किया। 1920 में इसका नाम बदलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कर दिया गया। सैयद अहमद खां का उद्देश्य था कि मुस्लिमों में भी आधुनिक शिक्षा का प्रसार हो और वे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में बेहतर योगदान करें। खां अब्दुल गफ्फार खां, मौलाना आजाद जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के अलावा जाकिर हुसैन, शेख अब्दुला, हामिद अंसारी आदि जैसे नेता ए.एम.यू. से निकले। यानी ए.एम.यू. से भी देश के लिए वैसे ही नेता-अफसर निकलते रहे हैं जैसे अन्य यूनिवर्सिटी से निकलते हैं।
संघी लम्पटों के हमले के वास्तविक कारणों पर विचार करें तो हम पाते हैं कि इसके जरिये वे समाज में हिन्दू-मुस्लिम धु्रवीकरण को बढ़ाना चाहते है और चुनावों में इससे बढ़त लेना चाहते थे। इससे जहां एक तरफ तात्कालिक चुनावी फायदा हासिल किया वहीं दूसरी तरफ अपने दूरगामी हितों के अनुरूप साम्प्रदायिक विचारों को बढ़ाने में भी वे सफल हुए।
आज जरूरत है कि सभी छात्र-नौजवान अपनी वास्तविक पहचान को सामने रखते हुए इन फासीवादी हमलों का मुकाबला करें। हमारी वास्तविक पहचान सिर्फ और सिर्फ छात्र और बेरोजगार की ही हो सकती है। इसी से हम अपने वास्तविक मुद्दों के लिए संघर्ष खड़ा कर सकते हैं और संघियों की कुटिल चालों को भी नाकाम कर सकते हैं।

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