19 June 2019

बिहार में बच्चों की मौत

मानव विरोधी पूंजीवादी व्यवस्था की भेंट चढ़ते मासूम बच्चे
     
       परिवर्तनकामी छात्र संगठन बिहार में दिमागी बुखार से मारे गए बच्चों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। दुख की इस घड़ी में परिवर्तनकामी छात्र संगठन शोकाकुल परिजनों के साथ है।
       

           बिहार के मुजफ्फरपुर व आस-पास के इलाकों में दिमागी बुखार "(चमकी बुखार)" से अब तक 138 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। बच्चों की मौत का सिलसिला अभी जारी है।

           इस बिमारी से मरने वालों की यह पहली घटना नहीं है। इससे पूर्व बिहार में ही 2014 में 86, 2015 में 11, 2016 में 4, 2017 में 4, 2018 में 11, बच्चों की मौत दिमागी बुखार से हो चुकी है।
                      
            कई बच्चों की मौत के बाद शासन-प्रशासन व मीडिया जागा, तब जाकर अस्पताल के दौरे शुरू किए गए। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री "तथाकथित सुशासन बाबू" नितीश कुमार तो अस्पताल में इंतजाम करना छोड़ के दिल्ली में घूमते रहे। बिहार में हो रही बच्चों की मौत पर चुप्पी साधे रहे। जब गए तो घोषणाएं कर आये। ये मौत के सौदागर अब मुआवजा देने की घोषणाएं कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में 13 बार बिहार का दौरा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व अमित शाह चुप्पी लगाकर बैठ गए। नेताओं की संवेदनहीनता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है पत्रकार वार्ता में एक मंत्री सोये रहे। वहीं दूसरे मंगल पांडे क्रिकेट का क्या स्कोर चल रहा है इसमें रुचि दिखाते रहे।
                   
         शासन-प्रशासन नेता अपने घड़ियाली आंसू रोने लगे हैं। अपनी नाकामी छिपाने के लिए कोई लीची को मौत का कारण बता रहा है। कोई जनता को ही इन मौतों का दोषी बता रहा है। जितने झूठे इनके आँसू हैं उतनी ही झूठी इनकी सांत्वना है। इस मामले में भी यही होता रहा। मामले को जैसे-तैसे ठंडा कर निबटने की कोशिश में हैं। साल दर साल हो रही मौतों के बाद भी सरकारें, शासन-प्रशासन सोता रहा। और अपने घड़ियाली आंसू बहाता रहा। पूरा शासन व तंत्र अगली घटना का इंतजार करता रहा ।
                      
           अब तक 138 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। मासूम बच्चों के घरों में मातम पसरा है। सैकड़ों लोगों के आँखों का चिराग उनके सामने दम तोड़ने को मजबूर है। अब शासन-प्रशासन कारवाई व उचित व्यवस्था की बात कर रहा है।
                 
   

            जैसा की भारत जैसे देश में स्वास्थ सेवाओं का हाल पूरे देश मे काफी खराब है। सरकारी मेडिकल कॉलेज व सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों, दवाइयों और आवश्यक उपकरणों की भारी कमी है। मुजफ्फरपुर में भी मेडिकल कॉलेज होने के बावजूद बाल रोग विभाग नहीं है, आई.सी. यू. की उचित सुविधा नहीं है। जबकि पिछली बार जब मुजफ्फरपुर में मौतें हुई थी तब घोषणाएं की गई थी। 
                       
            केंद्र सरकार व राज्य सरकारें इसकी पूर्ति नहीं करके "आयुष्मान" योजना जैसी स्वास्थ्य बीमा योजना लाई। जो बीमा कंपनियों को तो भारी मुनाफा पहुँचा रही हैं। आम जनता को जुमले के सिवा कोई राहत नहीं दे रही है।
                  
             दूसरी तरफ सरकारें निजी अस्पतालों को खुलने की छूट देकर स्वास्थ जैसे मूलभूत व आवश्यक चीज से पूंजीपतियों को मनमाना मुनाफा कमाने की छूट दे रही हैं। जिसको अंजाम तक पहुँचाने के लिए सरकारी अस्पतालों की हालात को खराब किया गया। और अपनी जिम्मेदारी से हाथ खींच लिए गए। इसी तरह गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन गैस की कमी के कारण कई बच्चों की मौत हुई थी। इस तरह की कई घटनाएं समय-समय पर घटती रही हैं।
                 
              यह सारी घटनाएं दिखाती हैं पूँजीवादी व्यवस्था गरीबों, शोषित-उत्पीड़ितों को आज कुछ भी देने लायक नहीं है। वह अम्बानी-अड़ानी जैसे पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए बच्चों की मौत का सौदा तक कर सकती है। इसलिए मानव विरोधी पूँजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष का रास्ता ही इस तरह कि व्यवस्था द्वारा जनित मौतों को रोका जा सकता है।

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