दुबारा सत्ता संभालते ही मोदी सरकार ने जनविरोधी फैसलों की झड़ी लगा दी है। ऐसा ही फैसला रेलवे के निजीकरण की रफ्तार को बढ़ाना है। इसका रेलवे कर्मचारियों सहित कई लोगों ने विरोध किया है।
रेलवे का निजीकरण टुकड़ों-टुकड़ों में पिछले तीन दशक से जारी है। इस प्रक्रिया को तेजी से आर्थिक सुधार लागू करने के अपने एजेण्डे के तहत मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में काफी तेजी ला दी। अब सत्ता संभालते ही इसकी गति और तेज कर दी गयी है।
रेलवे के निजीकरण का मुद्दा इस साल के बजट में कई गयी घोषणाओं के साथ जोर पकड़ा। रेलवे में तेजस नाम की ट्रेन के निजी संचालन की घोषणा ने निजीकरण के खिलाफ आक्रोश को भड़का दिया। पूरे देश मे रेलवे कर्मचारी जो पहले ही घटते कार्यबल के कारण अतिशय काम के नीचे दबे हुए थे सड़कों पर उतर आये। रेलवे मजदूरों और कर्मचारियों के बढ़ते प्रदर्शन के बीच संसद में रेल मंत्री पीयूष गोयल ने छल भरी घोषणा की कि 'रेलवे का निजीकरण कोई नहीं कर सकता'।
रेल मंत्री ने देश की आंखों में धूल झोंकते हुए कहा कि सरकार रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है बल्कि पी पी पी मॉडल अपना रही है। पीपीपी मॉडल सरकारी बड़ी और लाभकारी सम्पत्तियों, कारोबार से निजी क्षेत्र को मुनाफा कमाने की असीमित छूट देने के अलावा क्या होता है।
पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पी पी पी) के तहत इस सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में क्या किया था। जून 2017 में 23 रेलवे स्टेशनों की नीलामी कर दी थी। इस मॉडल के तहत निजी कम्पनियों को इन रेलवे स्टेशनों को विकसित व आधुनिक करना था। 15 साल तक रेलवे की जमीन लीज पर मिलनी थी। इस जमीन में निजी कम्पनियां भांति-भांति से लाभ कमा सकती थी। वे निजी कम्पनियां रेलवे की जमीन में होटल, मॉल, सिनेमा हॉल, अस्पताल, आदि खोलकर मोटा मुनाफा पीट सकती हैं।
और ऐसे ही 2014 में सत्ता संभालते ही मोदी सरकार ने रेलवे के ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( एफ डी आई) कि इजाजत पहले ही दे चुकी थी।
मोदी सरकार रेलवे स्टेशनों को निजी हाथों में सौंपती है; रेलवे की जमीन में मुफ्त में (जिसे लीज कहा जाता है) निजी कम्पनियों को व्यावसायिक संस्थान खोलने देती है; रेलवे के कोच आदि को बनाने का काम निजी हाथों में सौंपती है; विभिन्न ट्रेनों के निजी संचालन की घोषणा करती है; रेलवे के संचालन व ट्रेनों के रखरखाव के कामों को निजी हाथों में सौंपती है, आदि पर उसके बाद भी संसद में घोषणा करती है कि रेलवे का निजीकरण नहीं होगा। झूठ बोलने, पाखण्ड-प्रपंच करने में इस सरकार में सब माहिर हैं। रेलवे का निजीकरण भारत के शासकों का अघोषित एजेण्डा रहा है। घोषणा करने पर भारत के शासकों को भारी विरोध का सामना करना पड़ता इसलिए छल- झूठ का सहारा लेकर यह काम किया जा रहा है।
रेलवे के निजीकरण का पुरजोर विरोध आवश्यक है। रेलवे का निजीकरण न केवल देश के संसाधनों को मुनाफाखोर धनपशुओं की हवस के हवाले करने है बल्कि यह रेलवे के मजदूरों, कर्मचारियों, इन्जीनियरों के भी हितों के खिलाफ है। यह देश के गरीब मेहनतकश आम आबादी के भी खिलाफ है, जिसके लिए रेलवे एक सस्ता सुगम आवाजाही का साधन है। यह पूरी देश की जनता के भी खिलाफ है क्योंकि रेलवे के निजीकरण से जरूरी सामानों व मालों के भाड़े में भारी वृद्धि होगी और महंगाई आसमान छुयेगी।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन रेलवे के निजीकरण के खिलाफ संघर्षरत मजदूरों, कर्मचारियों व आम नागरिकों के साथ खड़ा है। हमें देशव्यापी स्तर पर व्यापक व जुझारू संघर्षों की शुरुआत करनी होगी ताकि रेलवे का निजीकरण रोका जा सके।

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