20 November 2019

फीस वृद्धि के हमलों का बहादुरी से सामना करते छात्र


         छात्रों का बहादुराना संघर्ष जिंदाबाद !

         जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र पिछले कई दिनों से फीसवृद्धि का विरोध कर रहे हैं। सरकार द्वारा बोले गये इस बड़े हमले का विरोध जरूरी था। छात्रों के बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन करने और फीसवृद्धि वापस करने की मांग को कुलपति ने अनसुना कर दिया। कान में तेल डाले और आंखों पर काली पटटी बांधे जेएनयू कुलपति संघी सरकार के कुशल स्वंयसेवक का रोल अदा करते हुए अड़ियल रुख पर कायम हैं। वकीलों से झगड़ा होने पर न्याय की गुहार लगाने वाली दिल्ली पुलिस छात्रों से बर्बरता से निपट रही है। दिल्ली पुलिस ने सरकार के इशारे पर जेएनयू छात्रों का सिर फोड़ा और उनके कपड़े खून से रंग दिये। उनको सड़कों पर घसीटा और जेलों में कैद कर दिया। इतने जुल्मों सितम के बाद भी जेएनयू के छात्र बहादुरी के साथ मैदान में डटे हैं। वे सरकार के शिक्षा को महंगा करने और शिक्षा के निजीकरण की इस मुहिम के सामने लोहे की दीवार की तरह खड़े हैं।


        जेएनयू की मासिक हास्टल फीस 2500 रू0 से बढ़ाकर 7500 रू0 प्रतिमाह और सिक्योरिटी का पैसा 5500 रू0 से बढ़ाकर 12000 रू0 कर दिया गया है। इस फीस वृद्धि के बाद जेएनयू केन्द्रीय विश्वविद्यायलों में सबसे महंगा विश्वविद्यालय हो जायेगा। जाहिर सी बात है कि संघी सरकार को जेएनयू की सवाल करने की संस्कृति पसंद नहीं है। केन्द्र की मोदी सरकार लाख कोशिशों के बाद जेएनयू को अपनी फासीवादी राजनीति के रंग में नहीं रंग पायी। इतना ही नहीं संघी सरकार ही हर फासीवादी हमले का जेएनयू के कड़ा प्रतिवाद किया और संघर्ष को जिंदा रखा। ठीक यही कारण है कि सरकार के अनुसार देश की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटियों में से एक को इस कदर बदले की भावना से निशाना बनाया जा रहा और उस वि.वि. में बहुत बड़ी फीस वृद्धि की की गयी है जिसमें 40 प्रतिशत छात्र ऐसे हैं जिनके परिवार की मासिक आय 12000 रू0 से कम है।

        जेएनयू पर हमला सिर्फ फीस वृद्धि के ही रूप में नहीं है बल्कि मैस में ‘‘उचित’’ कपड़े पहनने और हास्टल में रात्रि 11ः30 बजे तक लौटने जैसे गैर जनवादी कदमों पर भी जोर था। इनका परिणाम अंततः लाइब्रेरी में सुबह 3-4 बजे तक पढ़ने पर पाबंदी और ड्रेस कोड थोपना था। फीस वृद्धि के अलावा ये गैर जनवादी और आजादी को संकुचित करने वाले सरकार के कदम भी आंदोलन के कारण हैं। शिक्षा के निजीकरण की मुहिम का विरोध भी इस आंदोलन के कारणों में एक है। 

         जेएनयू के छात्रों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के छलावा भरे प्रस्तावों को दरकिनार कर अपना संघर्ष जारी रखा। इसी क्रम में 18 नवंबर को संसद मार्च तय किया गया। परंतु पुलिस-प्रसासन छात्रों को कैंपस के बाहर ही रोकने के सारे इंतजाम कर रखे थे। पुलिस, सीआरपीएफ बैरीकेड लगाकर दल-बल के साथ मौजूद थे। छात्रों के मार्च को बैरीकेड, भारी पुलिस बल और लाठीचार्ज के दम पर विफल कर दिया गया। कई छात्रों को गंभीर चोटें देकर हास्पिटल पहुंचा दिया गया। पर छात्र अभी भी डटे हुए हैं और आगे की योजना बना रहे हैं। 

        सरकार के फीस वृद्धि के हमले का शिकार जेएनयू के अलावा अन्य संस्थान भी हुए हैं। अक्टूबर 2019 का माह सरकारी/गैर सरकारी संस्थानों में फीस वृद्धि और उसके खिलाफ आवाज उठाते छात्रों के नाम रहा। 17 अक्टूबर को देहरादून के परेड ग्राउंड से खबर आयी कि निजी आयुर्वेदिक कालेजों के छात्रों को पीटा गया है और छात्राओं से बदसलूखी हुई है। पुलिस ने आदेश का पालन पूरी बर्बरता से किया। कुछ ही दिन गुजरे थे कि आई.आई.टी में फीस वृद्धि का फैसला सुनायी दिया। देशभर के आई.आई.टी में एम.टैक की फीस 80 हजार बढ़ाकर 2 लाख 50 हजार कर दी गयी। देशभर के आई.आई.टी के छात्रों ने इसका विरोध किया।

       उत्तराखण्ड में निजी आयुर्वेदिक कालेजों की फीस वृद्धि के खिलाफ छात्र सड़क से न्यायालय तक गये। सिंगल बैंच में जीते और डबल बैंच ने भी फीस वृद्धि को वापस लेने का फैसला दिया। लेकिन राज्य सरकार और प्रशासन ने कोई हरकत नहीं की। ऐसे में कालेज कहां अपने मन से फीस वापस लेने वाले थे। ऐसा तो तब और भी असंभव है जबकि ये कालेज सत्ताधारी भाजपा पार्टी के नेताओं और भाजपा से नजदीकी रखने वाले योग व्यापारी गुरू के हों। शिक्षा का व्यापार करने वाले अपने आप फीस वृद्धि वापस कभी नहीं लेंगे। अतः छात्र अपने परिजनों सहित धरने पर बैठे हैं पर कोई भी सुध लेने वाला नहीं है। शिक्षा को बेचने के इस खुले कारोबार पर सरकार मौन ही नहीं बल्कि पीछे से शिक्षा के व्यापारियों को संरक्षण दे रही है। 

         जेएनयू के छात्रों को देश भर से सहयोग-समर्थन मिल रहा है। जगह-जगह उनके समर्थन में कार्यक्रम किये जा रहे हैं। पूरे देश के छात्र फीस वृद्धि के खिलाफ इस संघर्ष को देख रहे हैं। और इसके सबक निकाल रहे हैं। 

         सरकारें नई शिक्षा नीति 1986 के बाद से ही शिक्षा के निजीकरण की तरफ बढ़ रही हैं। आज हालात वहां पहुंच गये हैं कि निजीकरण के दुष्परिणामों से तंग आकर इनका विरोध लगातार बढ़ रहा है। अब नई शिक्षा नीति के प्रारूप 2019 में शिक्षा के निजीकरण को ही और आगे बढ़ाने का कदम संघी सरकार द्वारा उठाये जा रहे हैं। कहीं आटोनामस तो कहीं फीस वृद्धि तो कहीं संसाधनों की कमी के जरिये इन कदमों को उठाया जा रहा है। कारपोरेट पूंजीपतियों को कर छूट, एनपीए की भरपाई शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक मदों पर कटौती कर की जा रही है। एक तरफ सांसदों-विधायकों-मंत्रियों पर प्रतिमाह लाखों की सब्सिडी और दूसरी तरफ शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मद में कटौती, एक तरफ बड़े-बड़े पूंजीपतियों को कर में छूट, सरकार द्वारा करोड़ों का विज्ञापन में खर्च और दूसरी तरफ मेहनतकशों की आवश्यकताओं के बेतहाशा कटौती यही आज के भारत की सच्चाई है। यही मोदी के नेतृत्व में अच्छे दिनों की तस्वीर है। 

        यह बात सच है कि जो सत्ता छात्रों की जायज मांगों को मानने के बजाय छात्रों से लाठी-जेल और पुलिस यातना देकर निपटती है उसके दिन लद चुके होते है। शासक पूंजीपति वर्ग की सेवा में नतमस्तक सत्ता छात्रों से निरंकुशता से निपट रही है तो वह आग से खेल रही है। इतिहास गवाह रहा है कि छात्रों-युवाओं ने ऐसी सत्ताओं को कई बार रसातल में पहुंचाया है। अगर आज देश के छात्र-युवा एक होकर शिक्षा पर बोले गये इस हमले का एकसुर में विरोध करते हैं तो वे न सिर्फ फीस वृद्धि के इस हमले को रोक सकते हैं बल्कि शिक्षा के निजीकरण की इस मुहिम पर ब्रेक भी लगा सकते हैं। छात्र-नौजवान अपनी एकता के दम पर इस पूंजीवादी निजाम को मिटाकर सबको निशुल्क और वैज्ञानिक शिक्षा का मार्ग खोल सकते हैं। 

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