ये 32 वर्षीय राजीव सुसाइड नोट के अंतिम शब्द हैं। जिसने इलाहाबाद में बेरोजगारी के चक्र में फँसकर आत्महत्या का रास्ता चुना। राजीव ने पीसीएस इंटरव्यू में असफल होने के बाद ये कदम उठाया। इसके जैसे हज़ारों बेबस मज़दूर, किसान, छात्र तथा नौजवान रोज ऐसे ही मौत को गले लगा ले रहे हैं।
आत्महत्याओं की ये स्थिति दिनों-दिन बद से बदतर होती जा रही है। ज़मीनी हकीकत ये है कि भारत सरकार की एजेंसी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक साल 2018 में 1,34,516 लोगों ने आत्महत्या की और 2019 में यह आंकड़ा 3.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1,39,123 जा पहुँचा। 2020 के आंकड़े आने अभी बाकी हैं।
आत्महत्या के इन मामलों में 4 प्रतिशत यानी 2,851 लोगो की मौत का कारण बेरोजगारी बताया गया, जबकि इन आत्महत्या करने वालों में 14,019 लोग बेरोजगार थे।
देश में बेरोजगारी ने पिछले साल ही अपने 45 साल के सारे रिकॉर्ड्स को पीछे धकेल दिया था। अब तो देश में कोरोना से बचाव के नाम पर मोदी सरकार के लॉकडाउन ने हालात और बदतर कर दिए हैं। बेरोजगारी आज चरम पर है तो अर्थव्यवस्था के हालात ये हैं कि अप्रैल-जून में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर ही (-23.9%) हो गयी है। देश की अर्थव्यवस्था बिल्कुल रसातल पर जा चुकी है। सभी लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं मेहनतकशों का कोई भी तबका ऐसा नहीं बचा रह गया है जो इस भीषण बेरोजगारी का शिकार नहीं हुआ हो !
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) देश के नौजवानों समेत सभी नागरिकों से अपील करता है कि बेशक देश में रोजगार के हालत बहुत खराब है, जीवन में असुरक्षा बहुत अधिक है। जिसकी सम्पूर्ण ज़िम्मेदार केवल यह पूंजीवादी सरकार है । पूंजीवाद में बेरोजगारी, पूंजीपतियों के लिए वरदान होती है। सरकार इस समय पूरी तरह पूंजीपतियों की सेवा में लीन है। ये पूंजीवादी निज़ाम मेहनतकशों के लिए नित नई समस्यायें पैदा कर रहा है।
लेकिन हमें इनसे भयभीत और हताश होने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है। बल्कि इस समय सबसे ज़रूरी चीज हमारे लिए यही है कि जितनी जल्दी हो सके वर्गीय चेतना को हम अपने अंदर विकसित कर लें और जो आज हमारे शासक हमारे मालिक होने का मुगालता पाले हुए हैं उनको यह बता दें कि देश और दुनिया सब हमारी ही मेहनत पर टिका हुआ है। क्रांति के बल पर सत्ता अपने हाथ में लेने के अलावा हमारे सामने कोई चारा बचा हुआ नहीं है।
साथियों, आत्महत्या किसी भी तरह से कोई समाधान नहीं है बल्कि पलायन का रास्ता है, जिससे समस्या तो जस की तस बनी ही रहती है। इतिहास में नौजवानों ने पलायन नहीं संघर्ष के रास्ते पर चलने का सबक दिया है। शहीद भगत सिंह ने अंतिम दम तक संघर्ष की प्रेरणा दी है। व्यक्तिगत तौर पर नहीं समस्या को सामाजिक तौर पर देखा जाना चाहिए, यह सबक दिया था। सब लोग अपने अधिकारों के लिए अपनी आवाज़ को बुलन्द करें। राजीव अगर यह समझ लेते तो जीवित होते। और करोड़ों-करोड़ मेहनतकशों के संघर्ष का हिस्सा होते। शासक पूंजीपति वर्ग की गुलामी में मशगूल सरकारें जो मेहनतकशों का हत्यारी हैं, उन्हें पूंजीपति वर्ग सहित इतिहास के अजायबघर में पहुंचाना होगा। तभी समस्याओं का अंतिम समाधान होगा।
हम सत्ता पर आसीन लोगों से चेतावनी के साथ मांग करते हैं कि :-
1- सार्वजनिक सम्पत्तियों का निजीकरण करना बंद करो।
2- बढ़ती बेरोजगारी पर अंकुश लगाने के लिए ज्यादा से ज्यादा रोज़गार के अवसर पैदा करो।
3- सभी रिक्त पदों पर अविलंब भर्तियां निकालो।
4- सभी बेरोजगारों को न्यूनतम 10000 बेरोजगारी भत्ता सुनिश्चित करो।
सभी मेहनतकश जनता एकजुटता के साथ अपनी आवाज़ बुलंद करे।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ-
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)


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