प्रसिद्ध इतिहासकार व वामपंथी बुद्धिजीवी प्रो. लाल बहादुर वर्मा जी का 17 मई को देहरादून में निधन हो गया। वह 5 मई को कोरोना से संक्रमित पाये गये थे। लम्बे इलाज के दौरान ह्रदय गति रुकने से उनकी मृत्यु हो गयी।
लाल बहादुर वर्मा जी इतिहास के प्राध्यापक थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से रिटायर्ड होने से पूर्व उन्होंने कई विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया। वह वामपंथी आंदोलन से भी जुड़े रहे। एक बराबरी पर आधारित, शोषण विहीन, भेदभाव रहित समाज का सपना वह ताउम्र संजोये रहे। समाज बदलाव की लड़ाई का हिस्सा रहते हुए उन्होंने लेखन, संपादन, वक्तव्य, रंगकर्म आदि के जरिये इस मुहिम को आगे बढ़ाया। उन्होंने लंबे समय तक वैज्ञानिक विचारधारा पर आधारित 'इतिहास बोध' पत्रिका का संपादन किया। उन्होंने इतिहास सहित कई किताबों का लेखन भी किया साथ ही प्रसिद्ध इतिहासकार एरिक हाब्सबाम की किताब 'क्रांतियों का युग' सहित कई किताबों का हिंदी अनुवाद भी किया। अध्यापन के दौरान उन्होंने कई नौजवानों के भीतर भी समाज बदलाव की लड़ाई का सपना जाग्रत किया।
लाल बहादुर वर्मा जी अब नही रहे। परन्तु उनका बराबरी पर आधारित समाज का सपना अभी भी जीवित है। अभी भी जीवित है इस समाज को बदलने की लड़ाई। इस लड़ाई को जीवित रखना और आगे बढ़ाना ही लाल बहादुर वर्मा जी को सच्ची श्रदांजलि होगी।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) समाज बदलाव की इस लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हुए लाल बहादुर वर्मा जी को विनम्र श्रदांजलि अर्पित करता है।

प्रफ़ेसर वर्मा को दिल से ख़िराज ए अक़ीदत!
ReplyDeleteइंसानियत पर मब्नी समाज का ख़्वाब देखना आज से ज़्यादा रोमांचकारी कभी नहीं था, और उसके लिए कोशिश करना एक ख़ूबसूरत ज़िद्द जैसा है।
इंक़लाब ज़िंदाबाद!
प्रफ़ेसर वर्मा को दिल से ख़िराज ए अक़ीदत!
ReplyDeleteइंसानियत पर मब्नी समाज का ख़्वाब देखना आज से ज़्यादा रोमांचकारी कभी नहीं था, और उसके लिए कोशिश करना एक ख़ूबसूरत ज़िद्द जैसा है।
इंक़लाब ज़िंदाबाद!