19 May 2023

नगीना कालोनी को रेलवे, शासन-प्रशासन द्वारा उजाड़े जाने का विरोध करो!



नगीना कालोनीवासियों के साथ में खड़े हों!

       रेलवे प्रशासन और स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने मिलकर 18 मई को लालकुआं (नैनीताल) उत्तराखंड की नगीना कालौनी को जमींदोज कर दिया। जहां रेलवे प्रशासन ने पूर्व में घोषित 200 मीटर से भी आगे बढ़कर 300 मीटर के आस-पास तक तोड़ दिया। इसमें लगभग 150 झोपड़ियां और कच्चे-पक्के मकान तोड़ दिए गए। घरों को तोड़ने की यह प्रक्रिया आज 19 मई को भी जारी रही। सैकड़ों घर आज भी जमींदोज किये गए।

       इस तोड़फोड़ का विरोध कर रहे स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की अध्यक्ष, 1 केंद्रीय कार्यकारणी साथी के साथ 12 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। जिन्हें फ़िलहाल 18 मई की शाम 7 बजे के बाद निजी मुचलके पर छोड़ा गया। साथ ही एसडीएम से लेकर तमाम प्रशानिक-पुलिस अधिकारियों ने घरों से उजाड़े गये कालोनीवासियों के साथ में मुजरिमों सा व्यवहार किया गया।

       उजाड़ दी गयी मजदूर-मेहनतकश जनता को प्रशासन ने अपने हाल पर छोड़ दिया। लोगों ने अपने बचे हुए सामान के साथ खुले आसमान के नीचे रात गुजारी। कुछ लोगों ने तुरत-फुरत में अन्य लोगों के घरों में आसरा लिया। लोग दिनभर भूखे-प्यासे अपना सामान समेटते रहे। शाम को जन संगठनों और परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) की अपील पर क्षेत्र की सामाजिक संस्था 'नेहा रोटी बैंक' के सहयोग से लोगों को भोजन कराया जा सका। जो कि आज भी तीनों समय जारी रहा। इसमें पछास के कार्यकर्ता भी सक्रिय रहे। प्रशासन ने उजाड़े गए लोगों के लिए भोजन का प्रबंध आदि इंतजाम न करके पानी और शौच के बारे में तक विचार नहीं किया। जबकि यह साफ था कि 4-5 हजार लोगों की आबादी में बच्चों, छात्रों, महिलाओं, गर्भवती महिलाओं, बीमार, सहित बुजुर्गों की भी बड़ी संख्या है। अब छात्रों की पढ़ाई से लेकर अन्य इंतजामों का होगा प्रशासन कोई जवाब नहीं दे रहा हैं। बात करने पर बस्तीवासियों को ही 'अवैध अतिक्रमणकारी' कह रहा है। तमाम परेशानियों को झेलते हुए बड़ी संख्या में लोग अपने लिए नए आशियाने ढूंढने के लिए बेचैन हैं।

         प्रशासन ने बस्ती को उजाड़ने में तत्परता दिखाते हुए उच्च न्यायालय, नैनीताल के फैसले का हवाला दिया। लेकिन यह बताये जाने के बावजूद की बस्तीवासी मामले में अपनी पैरवी के लिए सर्वोच्च न्यायालय, दिल्ली गए हैं, प्रशासन नहीं रुका। अदालतों की सर्वोच्चता का हवाला देने वाला प्रशासन व रेलवे ने बस्तीवासियों को अदालत जाने तक का भी मौका नहीं दिया। साफ है कि बस्ती मजदूर-मेहनतकश जनता की हो तो उजाड़ने में प्रशासन अतिसक्रिय हो जाता है। वहां मानवता के आधार पर भी कोई रियायत नहीं मिलती।

      अभी भी लोग उजाड़ दिए गए लोगों का इंतजाम करने, उनके पुनर्वास की स्थानीय प्रशासन, रेलवे व उत्तराखंड सरकार से मांग कर रहे हैं। साथ ही बची हुई बस्ती जो टूटी हुई सीमा से आगे है उसे बचाने में हर संभव प्रयास कर रहे हैं। उसके लिए प्रशासन से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक मांग उठा रहे हैं।

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

No comments:

Post a Comment