28 June 2023

जो अंग्रेज न कर सके वो योगी सरकार ने कर दिखाया।



'अशफ़ाक-बिस्मिल' को अलग करने की साजिशों का विरोध करो!

       योगी सरकार ने यूपी बोर्ड के कक्षा 9 से 12 तक के पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए 50 महापुरुषों के बारे में पढ़ाए जाने का फैसला किया है। इन महापुरुषों में संघ और भाजपा के प्यारे लोगों को भी शामिल कर लिया गया है। असल में महापुरुषों के जरिए अपने छद्म नायकों को इसमें शामिल करना ही योगी सरकार का मूल उद्देश्य है।


       आजादी के आंदोलन से गद्दारी करने वाले, अंग्रेजों के बजाय मुस्लिमों को अपना दुश्मन बताने वाले, अंग्रेजों से अपनी वफादारी के इनाम में पेंशन पाने वाले सावरकर को इसमें शामिल किया गया है। ये सावरकर वही हैं जो दो राष्ट्र (भारत और पाकिस्तान) का सिद्धांत लेकर आए। दो राष्ट्र के इस सिद्धांत ने भारत का विभाजन कराने में अपनी भूमिका निभाई थी। असल में सावरकर संघ और भाजपा के लिए ऐसे व्यक्ति हैं जो हिंदू और मुस्लिम के मध्य घृणा और विभाजन को निरंतर बढ़ाने में मदद करते हैं। वे संघ और भाजपा के लिए हिंदू राष्ट्र के हीरो रहे हैं। सावरकर के अलावा योगी सरकार ने दीन दयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी इस पाठ्यक्रम में पढ़ाने का फैसला किया है। योगी सरकार के राज में शिक्षा का भगवाकरण करने की यह नई मुहिम है। हिंदुत्व के विचारकों को पाठ्यक्रम में शामिल करने से वह अपने हिंदू फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहते हैं।


       लेकिन बड़ी बात यह है कि पाठ्यक्रम में बदलाव करने की इस मुहिम में, महापुरुषों को इसमें शामिल करने के लिए, उन्होंने राम प्रसाद 'बिस्मिल' को तो शामिल किया लेकिन अशफ़ाक उल्ला खां को इन महापुरुषों की श्रेणी से बाहर कर दिया है। हम सभी जानते हैं कि काकोरी कांड में और उससे पहले भी अशफ़ाक उल्ला खां और राम प्रसाद 'बिस्मिल' दो धर्मों के होने के बावजूद भी ऐसे मित्र थे जिनकी मित्रता की मिसाल बेमिसाल है। योगी सरकार ने अपनी कुटिल चाल चलते हुए राम प्रसाद 'बिस्मिल' को तो इस पाठ्यक्रम में शामिल किया है लेकिन अशफ़ाक उल्ला खां को उन्होंने महापुरुषों की श्रेणी से हटा दिया है। इस प्रकार योगी सरकार ने वह कारनामा कर दिखाया जो अंग्रेज भी ना कर सके। अंग्रेज राम प्रसाद 'बिस्मिल' और अशफ़ाक उल्ला खां की दोस्ती को कभी ना तोड़ सके। अशफ़ाक उल्ला खां और रामप्रसाद 'बिस्मिल' की दोस्ती एक मिसाल है। जो आज भी दी जाती है और भविष्य में होने वाले संघर्षों में भी उनकी मिसालें हमारा मार्गदर्शन करेंगी।


       हम सभी जानते हैं कि अशफाक उल्ला खां एक मुस्लिम थे और राम प्रसाद 'बिस्मिल' एक आर्य समाजी। लेकिन दो धर्मों के होने के बावजूद भी उन्होंने अपने मिशन, भारत की आजादी के लिए कभी भी मनमुटाव नहीं किया और वह एकजुट होकर भारत की आजादी के लिए संघर्ष करते रहे। और काकोरी कांड की घटना को अंजाम देकर अंततः उन्होंने अपनी शहादत पाई। अंग्रेज अशफ़ाक उल्ला खां और राम प्रसाद 'बिस्मिल' को कभी जुदा नहीं कर पाए। इस संघर्ष में वे साथ थे और शहादत के समय भी वे एक साथ थे। लेकिन योगी सरकार ने पाठ्यक्रम में रामप्रसाद 'बिस्मिल' को तो शामिल किया लेकिन अपनी हिंदू फासीवादी राजनीति के चलते अशफ़ाक उल्ला खां को हटा दिया। अशफ़ाक-बिस्मिल साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे। अंग्रेजी राज में जब शाहजहांपुर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुये तो अशफ़ाक-बिस्मिल दोनों ही उनको रोकने के लिये एक साथ निकल पड़े थे। अब योगी सरकार हिन्दू- मुस्लिम एकता की प्रतीक इनकी दोस्ती को तोड़ कर अपने घृणित फासीवादी एजेंडे के तहत खुद ही सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा दे रही है। इस तरह वे हिंदू फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।


       योगी सरकार के इस घृणित कारनामे के विरोध में प्रगतिशील छात्र-नौजवान, न्यायप्रिय लोग आगे आकर आवाज उठाएं। अशफ़ाक-बिस्मिल की साझी शहादत और साझी विरासत की एकता की रक्षा करें।

       परिवर्तनकामी छात्र संगठन योगी सरकार की भगवाकरण की इस मुहिम का पुरजोर विरोध करता है। परिवर्तनकामी छात्र संगठन काकोरी के शहीदों (अशफ़ाक उल्ला खां और रामप्रसाद बिस्मिल) की 'साझी शहादत- साझी विरासत' को जिंदाबाद करता है।


क्रांतिकारी अभिवादन के साथ -
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

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