21 March 2025

अमर शहीदों का अधूरा सपना मिलकर हमें है पूरा करना…


अमर शहीदों के 94वें शहादत दिवस पर छात्रों-नौजवानों को हमारा आह्वान।

साथियो,
          यह साल भारत की आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण घटनाक्रम काकोरी ट्रेन एक्शन का सौवां साल है। इस घटना ने लुटेरे अंग्रेजी साम्राज्य को सीधी चुनौती दी। देश की आजादी के लिए ही 27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद और 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु शहीद हो गए थे। आज उनकी शहादत को लगभग 100 साल पूरे होने को हैं, उन्हें याद करते हुए आज हमारे मन में कुछ सवाल उभरते हैं; कौन थे वे लोग जिन्होंने एक आदर्श के लिए अपने को कुर्बान कर दिया? कैसा देश बनाना चाहते थे वो और क्या उनके सपनों का भारत हम बना पाए हैं? आइए, इन सवालों पर विचार करें:

23 मार्च के शहीद कौन थे?
     काकोरी ट्रेन एक्शन की घटना में शामिल चंद्रशेखर आज़ाद 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए। शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश शासकों ने फांसी पर चढ़ा दिया। ये सभी क्रांतिकारी 1925 में काकोरी ट्रेन एक्शन के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन को आगे बढ़ा रहे थे। इन्होंने दुनियाभर के संघर्षों का अध्ययन कर पाया कि देश के मजदूरों-मेहनतकशों (आम जन) के लिए सच्ची आज़ादी केवल समाजवादी क्रांति से ही मिलेगी। उस समय तक केवल रूस में ही अक्टूबर समाजवादी क्रांति के बाद मजदूर राज कायम हुआ था। अध्ययन और समाज की बेहतरी के लिए सक्रियता ही इन क्रांतिकारियों के जीवन का लक्ष्य था।

ये क्रांतिकारी ऐसे क्यों थे?
     अन्याय सहकर न्याय के लिए लड़ने की प्रेरणा मिलती है। ब्रिटिश लुटेरे शासकों ने देश में जो लूट मचाई थी वो किसी से छुपी नहीं थी। देश के मेहनत की लूट से लेकर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज चमक रहा था। विरोध करने पर जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसे नरसंहार भी देश झेल चुका था। इस नरसंहार के विरोध में हुए देशव्यापी असहयोग आंदोलन को वापस लिए जाने से सभी आहत थे। ब्रिटिश शासकों की शह पर हिन्दू-मुस्लिम के साम्प्रदायिक विभाजन के ख़िलाफ़ थे। जातिगत भेदभाव की सामाजिक बुराई से परेशान थे। इन नौजवान क्रांतिकारियों ने अपनी सारी मेधा-सारी ऊर्जा देश की इन समस्याओं का समाधान पाने में लगाई। इसका एकमात्र जवाब था शोषणकारी व्यवस्था के हर रूप के बजाय मजदूर-मेहनतकश जनता के हाथ में सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण। यह लक्ष्य सिर्फ समाजवादी क्रांति से ही हासिल किया जा सकता था।

क्या आज हम छात्रों-नौजवानों के लिए करने को कुछ बचा है?
     आज देश में अमीरी-गरीबी की चौड़ी होती खाई को सभी जानते हैं। चंद अडानी, अम्बानी, टाटा, बिड़ला की बढ़ती दौलत बाकी मेहनतकश जनता की लूट पर टिकी है, सब महसूस करते हैं। और सरकार? क्या फर्क पड़ता है, किसकी है? तमाम वायदे कर सत्ता में आई मोदी सरकार का यह तीसरा कार्यकाल है। इससे आम मेहनतकश जनता की जिंदगी में क्या बदलाव आया? बुरे दिन और भी बुरे हो गए। सरकार की गलत नीतियों का विरोध करने पर सरकार ने हिटलरी राज की यादें ताजा करवा दी हैं। हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का इतना ज़हर घोला जा रहा है कि हर भला इंसान शर्मिंदा है। इस तरह देखें तो देश की मेहनतकश जनता को इस खंदक से बाहर निकालने के लिए काम ही काम है। छात्रों-नौजवानों की सारी ऊर्जा, सारी मेधा क्रांतिकारी नायकों की तरह देश की मेहनतकश जनता की बेहतरी के लिए लगाई जाए। हर चीज अगर करोड़ों-करोड़ मेहनतकश जनता के श्रम से पैदा होती है तो उस पर अधिकार भी करोड़ों-करोड़ मेहनतकश जनता का ही होना चाहिए। इससे कम कुछ भी होना लूट को किसी न किसी तरह जारी रखना ही है। सब व्यवस्था अगर जनता की बेहतरी के लिए है तो उस पर नियंत्रण भी मेहनतकश जनता का ही होना चाहिए। ऐसा न होना किसी न किसी रूप में तानाशाही ही है।

तुम्हारा विज्ञान व्यर्थ होगा और अध्ययन बाँझ अगर पढ़ते रहे बिना समर्पित किये अपनी बुद्धि को लड़ने के लिए सारी मानवता के शत्रुओं के विरुद्ध !
: बर्तोल्त ब्रेख्त

     परिवर्तनकामी छात्र संगठन क्रांतिकारियों के अधूरे छूटे कामों को पूरा करने के लिए सभी छात्रों-नौजवानों को संगठित होने का आह्वान करता है। इस मुहिम में सभी का स्वागत करता है

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
परिवर्तकामी छात्र संगठन (पछास)

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