16 January 2017

रोहित वेमुला की आत्म(हत्या) के 1 साल............

कैम्पसों के जनवादीकरण के लिए संघर्ष तेज करो!
फासीवादी-जातिवादी ताकतों के खिलाफ एकजुट हों!!

        आज 17 जनवरी को हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के 1 साल पूरे हो गए हैं। आज से ठीक 1 साल पहले रोहित ने विवि. प्रशासन व संघी ताकतों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न के दवाब में आत्म(हत्या) कर ली थी। रोहित की मौत के बाद पूरी संघी सरकार व विवि. प्रशासन रोहित की हत्या को आत्महत्या में बदलने का प्रयास करता रहा। जबकि ये जगजाहिर था कि आरएसएस का लम्पट छात्र संगठन एबीवीपी रोहित की आत्म(हत्या) में प्रत्यक्ष तौर पर शामिल था। यही नहीं पूरे विवि. प्रशासन ने संघ के इशारों पर उस फंदे को तैयार किया जिसपर अन्ततः मजबूर होकर रोहित वेमुला को झूलना पड़ा।

        रोहित वेमुला की मौत के बाद जहां एक तरफ इंसाफपसंद छात्र न्याय के लिए सड़कों पर थे तो वहीं दूसरी ओर तमाम नेता संसद के भीतर घड़ियाली आंसू बहाते हुए रोहित के हत्यारों को बचाने की जुगत में लगे हुए थे। रोहित की मौत के 1 साल बाद भी सभी आरोपियों (एबीवीपी के गुण्डों, वीसी अप्पा राव, बंदारू दत्तात्रेय, स्मृमि ईरानी आदि) का खुलेआम घूमना ये दिखाता है कि बीजेपी सरकार हत्यारों को बचाने में कामयाब रही है। यही नही बीते एक साल में कई और रोहित इन हत्यारों के हमलों का शिकार बने हैं।


        हैदराबाद विवि. के बाद से जेएनयू, इलाहबाद, जाधवपुर आदि विश्वविद्यालयों के छात्र संघी-फासीवादी हमलों का निशाना बने हैं। इनकी ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि ये कैम्पसों में छात्रों पर हमला कर उन्हें गायब तक कर दे रहे हैं। शायद ही कोई कैम्पस बचा हो जो इनकी लम्पट-गैरजनवादी कार्यवाहियों से अछूता रहा हो। और इस पूरी कार्यवाही में विवि. प्रशासन से लेकर पूरा सरकारी अमला इनके साथ खड़ा है।



        आज के समय में जब फासीवादी ताकतें समाज के हर कोने में नंगा नाच कर रही हैं तो कैम्पस भी इनके हमलों से बचे नही रह सकते। कैम्पसों में जनवाद के लिए लड़ी जाने वाली कोई भी लड़ाई सत्ता पर काबिज फासीवादी मंसूबों वाली बीजेपी सरकार व आरएसएस जैसे संगठनों के खिलाफ लक्षित कर के ही लड़ी जा सकती है। इस लड़ाई को हम अकेले नही जीत सकते। आज जरूरत बनती है कि समाज के मेहनतकश तबकों से हम अपनी लड़ाईयों को जोड़े। फैक्ट्री-खेतों-समाज के कोने-कोने में चल रहे संघर्षो का हिस्सा बने व मेहनतकशों को कैम्पसों में चल रहे संघर्षो का हिस्सा बनाए।

        आज पूरी दुनिया उस दोराहे पर खड़ी है जहां उसे फासीवाद या क्रांति में से एक का चुनाव करना है। लगातार संकटग्रस्त पूंजीवादी व्यवस्था, फासीवादी-दक्षिणपंथी ताकतों को खाद-पानी देने का काम कर रही है। यह संकट ही रोज ट्रम्प-मोदी सरीखे ‘नव हिटलरों’ को पैदा कर रहा है। फासीवाद के खिलाफ कोई भी संघर्ष पूंजीवादी व्यवस्था की जड़ों पर हमला किए बगैर नही जीता जा सकता। केवल समाजवादी क्रांति ही व्यवस्था की इन जहरीली जड़ों को खोद कर उसमें नए जीवन का संचार कर सकती है। समाजवाद ही चहुं ओर मंडराते फासीवादी काले बादलों के बीच से लाल सूरज को खींचकर ला सकता है। समाजवाद ही ऐसे समाज का निर्माण कर सकता है जहां हर एक मेहनतकश इंसान सच्चे जनवाद का स्वाद चख सकता है। जहां सवाल करना, बहस करना, आवाज उठाना अपराध ना होकर मानव समाज को नई उचाईयों तक उठाने का एक हथियार होगा। 

        समाजवाद ही एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य के शोषण का खात्मा कर के उन परिस्थितियों को पैदा करेगा जहां हर एक रोहित ‘कार्ल सैगान’ बनने के अपने सपने को पूरा कर सके। आइए रोहित की मौत के जिम्मेदार इस संघी निजाम के खिलाफ संघर्ष तेज करते हुए शोषण-उत्पीड़न मुक्त समाजवादी भारत के निर्माण का संकल्प लें। यही वक्त की मांग है।

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