9 December 2022

आर्थिक आधार पर आरक्षण के बहाने गरीब सवर्णों को छलती मोदी सरकार


      आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद सवर्णों हेतु 'आर्थिक आधार पर आरक्षण' पर मुहर लग गई। सर्वोच्च न्यायालय की 5 जजों की पीठ के 3:2 के फैसले के आधार पर सवर्णों हेतु 'आर्थिक आधार पर आरक्षण' जारी रहेगा। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने मोदी सरकार के पक्ष में फैसला 
सुनाया।

      मोदी सरकार ने वर्ष 2019 में सवर्णों हेतु आरक्षण की व्यवस्था की थी। इस हेतु आनन-फानन में संविधान में संशोधन कराया गया। इस संशोधन के जरिए मोदी सरकार ने आर्थिक आधार पर सामान्य वर्ग के 'गरीबों' हेतु 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी। 10 प्रतिशत का यह आरक्षण शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने और सरकारी नौकरियों में था। सामान्य वर्ग (सवर्णों) के लिए इस 10 प्रतिशत आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 3:2 से मोदी सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है। इससे पहले 1991 में जब नरसिम्हा राव की सरकार ने आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण देने का प्रस्ताव किया था तो सर्वोच्च न्यायालय ने इसे ख़ारिज करते हुए कहा था 'संविधान में आरक्षण का प्रावधान सामाजिक ग़ैरबराबरी दूर करने के मकसद से रखा गया है, लिहाजा इसका इस्तेमाल ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तौर पर नही किया जा सकता है।'

      इस फैसले को देते समय, पूर्व में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण की अधिकतम तय सीमा (50%) को भी लांघ दिया गया। ज्ञात हो कि 1990 में जब पिछड़ी जातियों हेतु, 27% आरक्षण का प्रावधान किया गया तो इंदिरा साहनी ने इसकी संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ी जातियों हेतु 27% आरक्षण दिए जाने को तो संवैधानिक माना और इसके साथ ही आरक्षण दिए जाने की अधिकतम तय सीमा 50% निर्धारित कर दी। सुप्रीम कोर्ट के ही निर्देश पर इसमें क्रीमी लेयर का भी प्रावधान हुआ। कुछ वर्ष पूर्व महाराष्ट्र सरकार द्वारा मराठों को दिये आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने इसी अधिकतम तय सीमा का हवाला देते हुए रद्द किया था। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा अधिकतम 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा हटाने से पिछड़ी जातियों के बीच से भी आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग उठना स्वाभाविक और न्यायिक होगा।


      इस फैसले के बाद संघ-भाजपा वह करने में सफल हो गए जिसके लिए वो लंबे समय से प्रयासरत थे। संघ-भाजपा दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण के घोर विरोधी रहे हैं। जातिगत आधार पर मिलने वाले इस आरक्षण के विरोध में वे लंबे समय से 'आर्थिक आधार पर आरक्षण' का तर्क देते रहे हैं। 'आर्थिक आधार पर आरक्षण' का यह तर्क कहीं से भी गरीबों के फायदे के लिए नहीं दिया जा रहा था बल्कि इसके पीछे की मंशा संघ-भाजपा के घोर सवर्णवादी होने और दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण का विरोधी होना था।

मोदी सरकार के 'गरीब' सवर्णों हेतु इस आरक्षण के दायरे में कौन आते हैं?

1. 8 लाख या इससे कम की पारिवारिक वार्षिक आय वाले यानी 66 हज़ार की मासिक आय वाले तक।
2. 5 एकड़ या इससे कम कृषि जोत वाले या एक हज़ार वर्ग फ़ीट का घर या नॉन नोटिफाई नगर पालिका क्षेत्र में 200 गज से छोटा प्लॉट।


      इन शर्तों के दायरे में सवर्णों की लगभग 90% आबादी आ जाती है। इस तरह सवर्ण गरीबों का भला करने की सारी बातें फर्जी साबित हो जाती हैं। यह वास्तविक गरीब सवर्णों के हाथों में एक झुनझुना थमा देने जैसा है।

      आज के हालात पर नज़र डालें तो सरकार आरक्षण का लाभ पाने वाले क्षेत्रों को ही खत्म करती जा रही है। निजीकरण, उदारीकरण, ठेकाकरण के दौर में सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ पाने के अवसर सिकुड़ते गए हैं। मोदी सरकार की नीतियां तो और तेजी से सरकारी संस्थानों को निजी हाथों में सौंप रही है। ऐसे में आरक्षण से लाभ पाने के अवसर भी और तेजी से घटते जा रहे हैं।


      आरक्षण का प्रावधान आर्थिक गैरबराबरी नही बल्कि सामाजिक गैरबराबरी को दूर करने के लिए किया गया था। जातिगत आरक्षण ने दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को ऊपर उठाने में एक सुधारात्मक कदम की भूमिका निभाई और यह आज भी निभा रहा है। इसने जातिगत बंधनों को भी कमज़ोर करने का काम किया है। लेकिन मोदी सरकार का गरीब सवर्णों हेतु 10% आरक्षण गरीबों की हालत में सुधार नहीं कर सकता। यह चंद लोगों को अवसरों का लाभ देकर ऊपर उठा सकता है, लेकिन गरीबी को ख़त्म नहीं कर सकता।

       गरीबी को ख़त्म करने के लिये किन्ही सुधारों की नहीं बल्कि मौजूदा पूंजीवादी समाज व्यवस्था में ही आमूल- चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपति वर्ग की जरूरतों को ध्यान में रखकर ही सभी नीतियों का निर्माण किया जाता है। पूंजीपतियों के फायदे के लिये ही निजीकरण- संविदा- ठेकाप्रथा की नीतियों को जोर- शोर से लागू किया जा रहा है। सरकारी संस्थानों- कम्पनियों को पूंजीपतियों को सौंपा जा रहा है। यह पूंजीवादी व्यवस्था ही है जो अपनी नीतियों से हर रोज़ ही गरीबों को और गरीब बनाने का काम करती है तो यह 10 प्रतिशत आरक्षण की बात बेमानी हो जाती है। गरीबों को किसी तरह का आरक्षण देकर गरीबी खत्म नहीं की जा सकती, इसके लिए पूंजीवाद को ही खत्म करना होगा और समाजवाद की स्थापना करनी होगी।

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