क्रांतिकारी कभी मरते नहीं हैं। वे बार-बार पीड़ित मेहनतकश जनता के दिलों में, संघर्षों में जिंदा हो जाते हैं। ऐसे ही क्रांतिकारियों में हैं- शहीद-ए-आजम भगत सिंह और उन्हीं के साथ शहीद हुए उनके साथी सुखदेव और राजगुरू। बल्कि कहा जाए तो उस समय की क्रांतिकारी धारा के चन्द्रशेखर आजाद, गणेश शंकर विद्यार्थी सहित तमाम क्रांतिकारी अजर-अमर हैं। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू को क्रूर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने शहीद कर दिया। 27 फरवरी 1931 को चन्द्रशेखर आजाद अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में लड़ते हुए शहीद हो गये। वहीं 25 मार्च 1931 को गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर में साम्प्रदायिक दंगों को रोकते हुए दंगाइयों द्वारा शहीद कर दिये गये। ब्रिटिश साम्राज्यवादी और सांप्रदायिक संगठन-लोग क्रांतिकारियों से बराबर घृणा करते थे। यही बात आजाद भारत की सरकारों और फासीवादियों-कट्टरपंथियों पर भी लागू होती है। वहीं दूसरी तरफ मेहनतकश जनता क्रांतिकारियों को बार-बार याद करते हुए गौरवान्वित महसूस करती है।
क्रांतिकारी क्यों इतना सम्मान पाते हैं? क्यों, न सिर्फ उनके दौर की जनता उन्हें प्यार करती है बल्कि, भावी पीढ़ी भी गर्व और सम्मान से उन्हें याद करती है?
इसका एकमात्र कारण क्रांतिकारियों द्वारा मज़दूर- मेहनतकश जनता का शोषण-उत्पीड़न करने वाली लुटेरी शासन सत्ता को उखाड़ फेंकने का संकल्प और संकल्प को पूरा करने के लिए हर त्याग- समपर्ण तथा आम जनता को असंभव सी लगने वाली कुर्बानी देने से भी न हिचकना है। क्रांतिकारियों की दूरदर्शिता हर गुजरते समय के साथ पूरी जनता को समझ में आने लगती है। इसीलिए वे अपने समय से भी अधिक भविष्य के नायक होतेे हैं। जो अपनी बारी में और आगे भविष्य के नायकों के प्रेरणास्रोत का काम करते हैं।
आज समाज में दो तरह के भगत सिंह हैं। एक वो, जो आपको गाड़ियों के पीछे स्टीकर, व्हाट्सएप/फेसबुक पर डिस्प्ले फ़ोटो की शक़्ल में दिखते हैं। दूसरे भगत सिंह वो हैं जिन्होंने अपनी समझदारी, वैचारिकी को आधार बनाकर कई सारे लेख लिखे। हिंदुस्तान की आज़ादी के तरीके और शोषण-गैर बराबरी से मुक्त आज़ाद हिंदुस्तान के बारे में लिखा, साम्प्रदायिकता पर लिखा, धर्म की कुरीतियों पर लिखा, जातिवादी शोषण पर लिखा और इन सारी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया।
अब आप खुद से सवाल करें कि आप कौन से भगत सिंह को जानते हैं? समाज की एक बड़ी आबादी भगत सिंह की इस वैचारिक पृष्ठभूमि को नहीं जानती। क्योंकि, भगत सिंह ने ब्रिटिश सरकार के दौर में जिन समस्याओं को चिन्हित किया और उस पर लिखा, वो सारी समस्याएं आज भी (कमोबेश वैसे ही) मौजूद हैं। इसलिए जो डर अंग्रेजों को भगत सिंह के विचारों से लगता था, वही डर आज की सरकारों/शासक वर्ग को भी लगता है। यही कारण है कि भगत सिंह का चेहरा दिखाकर शासक भगत सिंह के विचार छिपा लेना चाहते हैं।
भगत सिंह को याद करते हुए, उनके कथनों को एक नज़र से देखिएः ‘‘गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज शासन करेंगे’’, ‘‘साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी है’’, ‘‘ऐसी शिक्षा निकम्मी है जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए हो’’, ‘‘नौजवानों को क्रांति का संदेश मजदूर बस्तियों, कल-कारखानों, गांवों में ले जाना चाहिए’’, ‘‘इंकलाब की तलवार विचारों की शान पर तेज होती है’’ आदि-आदि। इन सबसे अधिक क्रांतिकारियों का प्रिय नारा तो आज हर आंदोलन में गूंजता है- ‘‘इंकलाब जिंदाबाद!’’
यह ‘‘इंकलाब जिंदाबाद’’ ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की ही तरह आज के शासकों-सरकारों को भी चुभता है। आज की सरकार गैरबराबरी और दमन को नई बुलंदियों तक ले गयी है। लोगों की जानें लेता बुलडोजर इसका सबसे नजदीकी उदाहरण है। इसी तरह साम्प्रदायिकता को नए आयाम दे हिन्दू फासीवाद तक पहुंचाया गया है। आज देश में जहां पूरी राज्य मशीनरी कहीं दलितों पर, कहीं आदिवासियों तो कहीं महिलाओं पर और सबसे अधिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कर रही है।
न्याय और बराबरी की मांग कर रही जनता को उत्पीड़ित किया जा रहा है। भले वे अग्निपथ योजना से लेकर भर्ती घोटालों के विरोध में छात्रों-नौजवानों के आंदोलन को कुचलना हो। मजदूरों के आंदोलनों का दमन करना हो। कर्मचारियों-छोटे कारोबारियों की मांगों को अनसुना करना हो। हर न्याय के संघर्ष-आंदोलन को पुलिस-कानून के दम पर ‘‘समाप्त’’ करने पर सरकारें तुली हुयी हैं। यही कारण है कि अम्बानी-अडानी जैसों की दौलत में दिन दुगुनी-रात चौगुनी वृद्धि हो रही है तो मेहनतकश जनता के कष्टों-परेशानियों में इससे भी तेज गति से बढ़ोत्तरी हो रही है।
इस बात को हर कोई महसूस कर रहा है कि इस लूट-अन्याय-धोखाधड़ी को धार्मिक उन्माद की आड़ में छुपाया जा रहा है। समय-समय पर हिन्दू-मुस्लिम की बहस फिर-फिर खड़ी कर दी जाती है। यही फासीवाद का असली चरित्र है। यही काम हमारे देश में हिन्दू फासीवाद कर रहा है।
ऐसे दौर में क्रांतिकारियों को सिर्फ याद करने का मामला नहीं रह जाता है बल्कि ऐसे जीवन को जीना वक्त की मांग है। हर जुल्म और शोषण के लिए उठ खड़े होना और मेहनतकश छात्र-नौजवानों- मजदूरों-महिलाओं-किसानों को लामबंद करना है। ऐसे में शासक नए ‘‘तर्ज-ए-जफा’’ कर रहे होंगे तो क्रांतिकारियों की विरासत को थामते लोग कहेंगे- ‘‘ये मुश्त-ए-खाक है फानी रहे रहे, न रहे’’। यही भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन सभी छात्र-नौजवानों व मेहनतकश जनता का इस हेतु आह्वान करता है। आइये! शहीदों के सपनों को सच करने की राह में हमारे हमसफर बनें।




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