22 December 2014

साम्प्रदायिकता के खिलाफ जुलूस-प्रदर्शन

19 दिसम्बर काकोरी के शहीदों की शहादत दिवस के अवसर पर परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने रामलीला मैदान से जंतर-मंतर तक एक रैली निकाली तथा जंतर-मंतर पर साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक सभा की।
    सभा को संबोधित करते हुए पछास के महेन्द्र ने कहा कि काकोरी के शहीद अशफाक और बिस्मिल साम्प्रदायिक सौहार्द की एक मिसाल हैं। उन्होनें धर्म भेद भुलाकर एक साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध करते हुए शहादत दी। लेकिन अशफाक-बिस्मिल-रोशन सिंह-राजेन्द्र नाथ लहिड़ी के देश में RSS-BJP जैसे संगठन साम्प्रदायिकता फैलाकर उनके विचारों को धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

18 December 2014

साम्प्रदायिकता के खिलाफ जंतर-मंतर चलो

प्रिय साथी,
       साथी जैसा कि आपको मालूम है कि केन्द्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद  से पूरे समाज में तेजी के साथ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किया जा रहा है।  साथ ही शिक्षा, संस्कृति आदि माध्यमों से भी समाज का भगवाकरण करने की साजिशें की जा रही हैं। 
      पूरी दुनिया की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। जिसके परिणाम स्वरूप पूंजीपति वर्ग अपने-अपने देशों में मेहनतकशों का खून निचोड़ने के लिए तेजी से आर्थिक नीतियों को लागू कर रहा है। जो जनता के  बडे विरोध-प्रदर्शनों को जन्म दे रहा है। इन विरोध-प्रर्दशनों को रोकने और व्यवस्था को बचाने के लिए पूंजीपति वर्ग तेजी से दक्षिणपंथी ताकतों के साथ गठजोड़ कर रहा है। इसका ही परिणाम है कि अधिकांश देशों के संसदीय चुनावों में दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता में आयी हैं।

लालकुंआ(उत्तराखण्ड) में साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने वालों का विरोध करो। पछास व प्रमएके कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट करने वाले संघी गुंण्डों को गिरफतार करो।।


लालकुआँ (नैनीताल), उत्तराखण्ड:  10 दिसंबर को एक लड़का और लड़की के घर से चले जाने के की घटना को हिंदुत्ववादी संगठनों के सांप्रदायिक रंग देने की पूरी कोशिश की क्योंकि लड़का मुस्लिम था और लड़की हिंदु। लड़की के घर वालों ने लड़के पर अपहरण का केस दर्ज कराया जिसको पुलिस ने दर्ज कर लिया लेकिन लड़के के परिजनों द्वारा अपने लड़के की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने पर पुलिस ने गुमशुदगी भी दर्ज नहीं की। इसी बीच ऐसे मुद्दों की ताक में बैठे रहने वाले सांप्रदायिक संगठन (आर.एस.एस, बजरंग दल, भाजपा और एबीवीपी) अपने पूरे दम खम से इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने और मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलने में मशगूल हो गए। उन्होंने जुलूस निकालकर, कोतवाली का घेराव कर डीएम से मिलकर अपनी सक्रियता का प्रदर्शन किया।  इससे पूर्व लालकुंआ में ही 7 वर्षीय बालिका चंचल के गुम होने पर हमारे द्वारा किए गए आंदोलन के दौरान निमंत्रण देने के बाद भी एक भी दिन संगठनों के नेताओं/कार्यकर्ताओं ने अपनी शक्ल तक भी नहीं दिखाई। असल में यही पाखंड ही इन का चरित्र है।

8 September 2014

प्रेम करने का जनवादी अधिकार और तथाकथित ‘लवजेहाद’


    आजकल पूरी ही संघ मण्डली ने मिलकर एक नया प्रपंच खड़ा किया है। राम मंदिर, राम-सेतु के बाद ये नया प्रपंच ‘लवजेहाद’ का है। उनका कहना है कि मुस्लिम लड़कों द्वारा हिन्दू लड़कियों को बहला-फुसलाकर उनसे शादी कर जबरन उनका धर्म-परिवर्तन करवाया जा रहा है। मजेदार बात ये है कि खुद बीजेपी और संघ के कई नेताओं ने भी अंर्तधार्मिक विवाह किया है, पर बीजेपी की नजर में ये ‘लवजेहाद’ का हिस्सा नहीं है।

16 August 2014

सिविल सेवा परिक्षा और भाषा का सवाल

    पिछले दो माह से सिविल सेवा परीक्षा के ‘सीसैट’ के पेपर का हिन्दी भाषी क्षेत्र से आने वाले छात्र विरोध कर रहे थे। ये छात्र ‘सीसैट’ के पेपर में अपनाए जा रहे पैटर्न को गैरबराबरी पूर्ण मानते हुए इसे हटाने की मांग कर रहे हैं। लगातार ‘हिन्दी-हिन्दी’ चिल्लाने वाली बीजेपी सरकार निर्लज्जता के साथ छात्रों की इस समस्या का हल लाठी-डंडों से कर रही है।

6 April 2014

केवल सरकार बदलने से व्यवस्था नहीं बदलेगी

       पूरा देश इस समय लोकसभा चुनाव के रंग में रंगा हुआ है। सारी पार्टियां और नेता दावा कर रहे हैं कि वे ही देश की तस्वीर बदल सकते हैं। ऐसे में छात्र-नौजवानों को विचार करना है कि क्या इन पार्टियों और नेताओं के दावों में कोई सच्चाई है? कुछ ज्वलंत सवाल बनते हैं, जिन पर हमें गंभीरता से सोचना होगा।

22 March 2014

23 मार्चः शहादत दिवस

   छात्र-नौजवान देश का भविष्य होते हैं। बेहतर भविष्य के लिए उन्हें वर्तमान में संघर्ष करना होता है। किंतु इस संघर्ष को अधिकांश नौजवान अलग-थलग पड़कर और केवल अपने बेहतर भविष्य के लिए कर रहे होते हैं। समूह, देश और समाज की चिंता करना उन्हें नहीं सिखाया जाता। इसलिए वे राजनीति से भी दूर रहते हैं।

6 March 2014

महिलाओं के मुक्ति-संघर्ष का आह्वान करने वाला दिन


   08 मार्च मेहनतकश महिलाओं के न्यायसंगत विद्रोहों का प्रतीक दिवस है। इसकी शुरूआत 1910 में यूरोप की समाजवादी क्रांतिकारी महिलाओं ने की थी। इन क्रांतिकारी महिलाओं के नेतृत्व में उस समय मेहनतकश महिलायें ‘घरेलू दासता से मुक्ति’, ‘समान काम का समान वेतन’, ‘10 घंटे का कार्य दिवस’, ‘यूनियन बनाने का अधिकार’, ‘सार्विक मताधिकार’ जैसे न्यायपूर्ण मांगों के लिए लड़ रही थीं।