कालेजों-विश्वविद्यालयों में जनवादी माहौल हो, इसके लिए छात्र-छात्राओं ने इतिहास में जुझारू संघर्षो को खड़ा किया है। पूंजीवादी शासकों की भरसक कोशिश रही है कि युवा हमेशा उनके इसारे पर नाचते रहें। पूंजीवादी शसक छात्रों की जनवादी-क्रांतिकारी सोच व संघर्ष से भय खाते रहे हैं। देश में जनवाद, लोकतंत्र का राग अलापने के बरक्स वह छात्रों के राजनीतिक अधिकारों को सैकड़ों तरीको से कुचलते रहे है। किन्तु छात्र समुदाय ने अपने व देश-दुनिया के क्रांतिकारी संघर्षो से जो चेतना हासिल की, उसके कारण वह अपने जनवादी अधिकारों के प्रति सचेत रहा है। परन्तु शासक वर्ग इस सीमित जनवाद को भी खत्म करना चाहता है। UGC(विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा अप्रैल 2015 में जारी की गयी गाइडलाइन भी शासक वर्ग की इसी चाहत को पूरा करती प्रतीत होती है।
24 September 2015
13 September 2015
महाराष्ट व छत्तीसगढ सरकार ने लगाया मास पर प्रतिबंध
हम जो चाहेगें सब वही खायेंगे
जैन धर्म पर्व का बहाना बनाकर महाराष्ट व छत्तीसगढ सरकार ने मास की ब्रिक्री पर दो दिनों के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। पहले यह प्रतिबंध महाराष्ट में 4 व छत्तीसगढ में 9 दिनों के लिए लगाया गया था। दोनों प्रदेश सरकारों द्वारा सुनाया गया यह फरमान सवर्णवादी- ब्राहमणवादी सोच से भरा हुआ है। भाजपा सरकार लगतार समाज में ब्राहमणवादी मूल्य थोप रही है। किसी भी सरकार को यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि लोग क्या खायें क्या पहने। किन्तु देश में भाजपा सरकार यही सब कर रही है।
साम्राज्यवादी कुकर्मों के कारण दर-दर भटकते लोग
सीरिया से बड़े पैमाने पर लोग अपना घर-बार छोड़कर दर-दर भटक रहे हैं।ये सभी यूरोपीय देशों में शरण लेने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। असुरक्षित यात्रा में कई लोग भूख-प्यास से भी मर जा रहे हैं। बीबीसी के अनुसार इस वर्ष 3 लाख 40 हजार लोग अपना वतन छोड़कर शरण लेने के लिए मजबूर हुए हैं। सीरियाई लोगों का दर्द देखकर यूरोपीय देशों के नागरिकों ने उनका साथ देने के लिए प्रदर्शन किये। इसके बावजूद पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासक शरणार्थियों को अनचाहा बोझ समझकर तरह-तरह के बहाने बनाकर इसे रोकना चाहते हैं। हंगरी ने तो शरणार्थियों को रोकने के लिए तार-बाड़ खड़ी कर दी है। साम्राज्यवादी आईएसआईएस की उनके देश में घुसपैठ का बहाना बनाकर शरणार्थियों को शरण देने में अडंगे लगा रहा है। इस सबके बावजूद एक दिन भी ऐसा नहीं गया जबकि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों ने मानवता के नाम पर झूठे आंसू ना बहाये हों।
4 September 2015
बदलाव लाने में अक्षम यह लोक लुभावन फैसला
इलाहबाद उच्च न्यायलय ने 18 अगस्त 2015 को बेहद ‘लोकप्रिय’ फैसला सुनाया। यह फैसला कहता है कि सभी सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, जज, जनप्रतिनिधि अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ायेंगे। न्यायलय के इस फैसले के बाद तमाम बुद्धिजीवी बेहद खुश नजर आ रहे हैं। वे इसे सरकारी स्कूलों के हालात में सुधार व पैसे के आधार पर शिक्षा में भेदभाव की समाप्ति के तौर पर देख रहे हैं।
3 September 2015
प्रो. एम.एम. कुलबर्गी की हत्या का विरोध करो!
प्रो0 एम0एम0 कुलबर्गी को तर्कपरकता और धार्मिक अंधविश्वास का विरोध करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। प्रो0 कुलबर्गी हम्पी यूनिवर्सिटी के पूर्व वायस चांसलर (कुलपति) थेे और अपने लेखों व लिखी किताबों के द्वारा धार्मिक पोंगापंथ का विरोध करने का काम करते रहे थे। उनकी 30 अगस्त को उनके घर पर ही गोली मारकर हत्या कर दी गयी। अपने काम के कारण उनको लंबे समय से हिन्दू फासीवादी संगठनों द्वारा आलोचना व धमकी का शिकार होना पड़ा था।
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