14 March 2016

फासीवाद या क्रांति? तय करो किस ओर हो तुम !

        जेएनयू प्रकरण ने इस बात को बहुत अच्छी तरह से स्थापित किया है कि देश में फासीवादी खतरा हमारे समाने मुंह बांए खड़ा है। इसी प्रकरण ने ये भी स्थापित किया कि ये संघी सरकार अपने घृणित मंसूबों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाकर छल-कपट कर सकती है। मीडिया के जरिए फर्जी वीडियो को प्रचारित कर जनता के बीच अंधराष्ट्रवादी माहौल तैयार किया गया। पुलिस का इस्तेमाल कर जेएनयू को छावनी में तबदील कर दिया गया। व्यवस्था का एक-एक पुर्जा तथाकथित देशभक्ति की आड़ में तथाकथित देशद्रोहियों को कुचलने को तैयार हो गया। तमाम तरह के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित संघी सरकार के सामने देश के छात्र-नौजवानों का चुनौती प्रस्तुत करना निश्चित ही काबिले तारीफ है। सटीक क्रांतिकारी समझ और क्रांतिकारी जुझारूपन इस संघर्ष को नयी उंचाईयां देगा, संघी फासीवाद की कब्र को और गहरा करेगा। 

21 February 2016

वक्त आ गया है बता दें, हमारे शरीर में शहीद भगत सिंह का खून दौड़ता है

        भारतीय समाज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रकरण के बाद दो विशाल शिविरों में बंट सा गया है। एक तरफ तथाकथित राष्ट्रवादी हैं तो दूसरी तरफ करोड़ों-करोड़ सामान्य जन। एक तरफ हैं वे जिनका राष्ट्रवाद निर्दोष विद्यार्थियों, शिक्षकों, पत्रकारों पर हमला करने से प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। दूसरी तरफ वे लोग हैं जो कदम-कदम पर ऐसी ताकतों को चुनौतियां दे रहे हैं, जो भारत को हिन्दू फासीवाद की अंधी गली में धकेलना चाहते हैं।

14 February 2016

जेएनयू को पुलिस छावनी में तब्दील किये जाने का विरोध करो!

      संघ मंडली के छद्म राष्ट्रवाद को बेनकाब करो!
        छात्रों पर लगाये देशद्रोह के मुकदमें वापस लो! 
साथियो,
        देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में शुमार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) आजकल पुलिस छावनी में तब्दील है। पुलिस द्वारा जेएनयू के मुख्य द्वार की नाकेबंदी कर परिसर एवं हाॅस्टलों में छात्र-छात्राओं के कमरों की तलाशी एवं गिरफ्तारी को लेकर छापेमारी की जा रही है। पुलिस की कार्यवाही तथा मीडिया द्वारा इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है कि मानो जेएनयू देश विरोध एवं देशद्रोहियों के अड्डे में तब्दील हो गया हो। कई मीडिया चैनल तो बाकायदा ‘ट्रायल’ बैठाकर जेएनयू के छात्रों को देशद्रोही का आरोपी घोषित कर सख्त सजा सुनाने पर आमादा हैं। ये मीडिया चैनल न्यायिक जांचों और न्यायालय से भी ‘ऊपर’ हो गये हैं।

20 January 2016

ये दुखी होकर बैठने का नहीं हत्यारी व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर उतरने का समय है

रोहित वेमुला की ‘आत्महत्या’ प्रकरण

        17 जनवरी को हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक दलित छात्र रोहित ने हास्टल में आत्महत्या कर ली। 28 वर्षीय रोहित पी.एच.डी. द्वितीय वर्ष का छात्र था। लगभग, पिछले 15 दिनों से रोहित व अन्य छात्रों को हास्टल से निष्कासित कर दिया गया था। ये पांचों छात्र दलित थे तथा अंबेडकर स्टूडेंट एसोसियेशन(ए.एस.ए.) के सक्रिय सदस्य थे।

19 January 2016

It's a Murder, Not Suicide! Punish the Murderers of Rohith !

        Rohith Vemula’s suicide  has shaken the entire student community and once again laid bare the oppressive norms of caste operating in our University  premises. It also exposes how the combined force of the ruling government, Vice-Chancellor of University of Hyderabad, MHRD minister Smriti Irani and ABVP president Susheel Kumar has put an end to the dreams of a Dalit student who wanted to be a man of science and a witer like Carl Sagan but unfortunately only got to write his own suicide letter.

6 January 2016

डीयू को साम्प्रदायिक ताकतों का केन्द्र बनाए जाने का विरोध करो!

‘न त्रिशूल-न तलवार’ , हमें चाहिए रोजगार!!
        
        आने वाली 9 जनवरी को डीयू में अरूंधति वशिष्ठ परिषद पीठ(जोकि विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ा संगठन है) द्वारा ‘राम जन्म भूमि’ के मामले पर एक सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें अयोध्या में मंदिर बनाए जाने के मामले पर जनमत तैयार करने की योजना बनाए जाने पर चर्चा की जाएगी। शुरू से ही यह मुद्दा विवादों से भरा रहा है राजनीतिक दल अपने-अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप इसे हवा देते आयें हैं। जिनका परिणाम बड़े पैमाने के साम्प्रदायिक दंगों और मेहनतकश आबादी के बीच साम्प्रदायिक विभाजन के मजबूत होने के तौर पर सामने आया है। अब फिर से RSS व BJP यही सब करने की घृणित मंशा पाल रही हैं। 

25 December 2015

कड़ा कानून नहीं, पूंजीवाद के खिलाफ कड़ा विरोध जरूरी

        निर्भया हत्याकाण्ड के तीन वर्ष बाद एक बार फिर सख्त कानून की बहस जोरों पर है। राज्यसभा ने कानून बनाकर जघन्य अपराधों के दोषियों के लिए उम्र 18 से घटाकर 16 कर दी है। लोकसभा इसे पहले ही पास कर चुकी है।

15 December 2015

शासकों के दमन के बाद भी जल रही है आक्यूपाई यूजीसी आंदोलन की मशाल

        यू.जी.सी. द्वारा अक्टूबर में नाॅन नेट फेलोशिप को खत्म किये जाने की घोषणा के बाद से शुरू हुआ आक्यूपाई यू.जी.सी. आंदोलन निरंतर जारी है। 21 अक्टूबर से शुरू हुए इस आंदोलन को निरंतर ही सरकार के दमन का सामना करना पड़ा है। 23 अक्टूबर, 27 अक्टूबर के बाद अब 9 दिसम्बर को छात्रों को पुलिसिया दमन सहना पड़ा। 9 दिसम्बर को छात्रों की पहले से ही प्रस्तावित रैली पर दिल्ली पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया। यू.जी.सी. भवन से संसद मार्ग तक शांतिपूर्वक रैली निकाल रहे छात्रों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए, वाटर कैनन से उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया। पुलिस द्वारा छात्राओं को टारगेट करके हमला किया गया। लगभग 150 छात्रों को गिरफ्तार करके थाने ले जाया गया जहां देर रात उन्हें छोड़ दिया गया। पुलिस के इस हमले में लगभग डेढ़ दर्जन छात्र/छात्राएं घायल हुए। इस भारी दमन के बाद भी छात्रों का हौंसला टूटा नहीं है और उन्होंने 14 दिसम्बर को इस पुलिसिया दमन के खिलाफ तथा आंदोलन के समर्थन में पूरे देश में प्रदर्शन करने की अपील सभी छात्र संगठनों से की है।

18 November 2015

असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी

इन दिनों साहित्यकारों और कलाकारों द्वारा पुरस्कार वापसी की बाढ़ आ गयी है। उदय प्रकाश से लेकर अरूंधति राय समेत दर्जनों लोग पुरस्कार वापसी कर चुके हैं। यह क्रम अभी भी जारी है। साहित्यकारों, कलाकारों की यह क्षुब्धता बीते समय में देश में बढ़ी असहष्णिुता का प्रतिकार है। कन्नड़ विद्वान कलबुर्गी की हत्या जैसी घटनाएं समाज में बढ़ी हैं। वहीं दादरी में अखलाक की दर्दनाक हत्या ने पूरे समाज को ही क्षुब्धता से भर दिया है। देश कहां जा रहा है? जैसा सवाल तीखे ढंग से सभी के सामने आ उपस्थित हुआ है।

9 November 2015

पछास का 9वां सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न

        पछास का 2 दिवसीय 9वां सम्मेलन 31 अक्टूबर-1 नवंबर को दिल्ली में आयोजित किया गया। सम्मेलन में संगठन के उत्तराखण्ड, यूपी तथा दिल्ली से आए प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। 31 अक्टूबर को पूरे दिन व 1 नवंबर की दोपहर तक बंद सत्र चलाया गया। बंद सत्र के दौरान पिछले 2 सालों में देश-दुनिया में आए बदलावों पर गहन विचार-विमर्श करते हुए तथा इन बदलावों की रोशनी में अपने लिए नए कार्यभार चुनते हुए राजनीतिक व सांगठनिक रिर्पोट को ध्वनि मत से पारित किया गया। संगठन को आगामी सम्मेलन तक नेतृत्व देने के लिए नए नेतृत्व का चुनाव भी बंद सत्र के दौरान किया गया।