18 November 2015

असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी

इन दिनों साहित्यकारों और कलाकारों द्वारा पुरस्कार वापसी की बाढ़ आ गयी है। उदय प्रकाश से लेकर अरूंधति राय समेत दर्जनों लोग पुरस्कार वापसी कर चुके हैं। यह क्रम अभी भी जारी है। साहित्यकारों, कलाकारों की यह क्षुब्धता बीते समय में देश में बढ़ी असहष्णिुता का प्रतिकार है। कन्नड़ विद्वान कलबुर्गी की हत्या जैसी घटनाएं समाज में बढ़ी हैं। वहीं दादरी में अखलाक की दर्दनाक हत्या ने पूरे समाज को ही क्षुब्धता से भर दिया है। देश कहां जा रहा है? जैसा सवाल तीखे ढंग से सभी के सामने आ उपस्थित हुआ है।

9 November 2015

पछास का 9वां सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न

        पछास का 2 दिवसीय 9वां सम्मेलन 31 अक्टूबर-1 नवंबर को दिल्ली में आयोजित किया गया। सम्मेलन में संगठन के उत्तराखण्ड, यूपी तथा दिल्ली से आए प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। 31 अक्टूबर को पूरे दिन व 1 नवंबर की दोपहर तक बंद सत्र चलाया गया। बंद सत्र के दौरान पिछले 2 सालों में देश-दुनिया में आए बदलावों पर गहन विचार-विमर्श करते हुए तथा इन बदलावों की रोशनी में अपने लिए नए कार्यभार चुनते हुए राजनीतिक व सांगठनिक रिर्पोट को ध्वनि मत से पारित किया गया। संगठन को आगामी सम्मेलन तक नेतृत्व देने के लिए नए नेतृत्व का चुनाव भी बंद सत्र के दौरान किया गया।

23 October 2015

UGC द्वारा नाॅन-नेट फेलोशिप को खत्म किए जाने का विरोध करो!

        UGC ने 7 अक्टूबर को दिए गए अपने एक फैसले के द्वारा अगले सत्र से केन्द्रीय विद्यालयों में M.Phil. व Ph.D. छात्रों को मिलने वाली नाॅन-नेट फेलोशिप को खत्म करने का फैसला कर लिया है। इससे पहले इन छात्रों को शोध के लिए क्रमशः 5 व 8 हजार रूपये प्रति माह मिलते थे। सरकार द्वारा दी जा रही इस आर्थिक सहायता से छात्रों को अपने परिवारों पर बोझ बने बिना अध्ययन करने का मौका मिल पाता था। जिससे वो आसानी से अपना शोध जारी रख सकते थे। परंतु UGC के इस फैसले के बाद केवल आर्थिक रूप से समृद्ध छात्र ही शोध के क्षेत्र में पहुंच पाएगें।

21 October 2015

Parivaratankami Chhatra Sangthan's 9Th Conference Long Live

Parivaratankami Chhatra Sangthan(PACHHAS) is going to hold its 9th conference from 31st October to 1st November in Delhi. The closed session will take place from 31st October  to 1st  Novemebr 3’o clock. During this session we will discuss about the three divisions of Political report namely International, National and student movements. Later on we will take up national-international situation and discuss about the challenges faced by our student organization.

पछास का 9वां सम्मेलन जिन्दाबाद

परिवर्तनकामी छात्र संगठन का 9वां सम्मेलन 31 अक्टूबर व 1 नवम्बर 2015 को दिल्ली में आयोजित होने जा रहा है। 31 अक्टूबर से 1 नवम्बर की दोपहर तक बंद सत्र चलाया जायेगा। इस सत्र के दौरान अंतराष्ट्र्रीय, राष्ट्र्रीय व छात्र जगत तीन हिस्सों में बटी राजनीतिक रिपोर्ट पर चर्चा की जायेगी। उसके उपरांत देश-दुनिया के राजनीतिक हालातों का जायजा लेकर संगठन की समस्याओं और चुनौतियों पर चर्चा की जायेगी।

24 September 2015

कालेज-कैम्पसों को ‘जेल’ बनाए जाने का विरोध करो!

कालेजों-विश्वविद्यालयों में जनवादी माहौल हो, इसके लिए छात्र-छात्राओं ने इतिहास में जुझारू संघर्षो को खड़ा किया है। पूंजीवादी शासकों की भरसक कोशिश रही है कि युवा हमेशा उनके इसारे पर नाचते रहें। पूंजीवादी शसक छात्रों की जनवादी-क्रांतिकारी सोच व संघर्ष से भय खाते रहे हैं। देश में जनवाद, लोकतंत्र का राग अलापने के बरक्स वह छात्रों के राजनीतिक अधिकारों को सैकड़ों तरीको से कुचलते रहे है। किन्तु छात्र समुदाय ने अपने व देश-दुनिया के क्रांतिकारी संघर्षो से जो चेतना हासिल की, उसके कारण वह अपने जनवादी अधिकारों के प्रति सचेत रहा है। परन्तु शासक वर्ग इस सीमित जनवाद को भी खत्म करना चाहता है। UGC(विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा अप्रैल 2015 में जारी की गयी गाइडलाइन भी शासक वर्ग की इसी चाहत को पूरा करती प्रतीत होती है।

13 September 2015

महाराष्ट व छत्तीसगढ सरकार ने लगाया मास पर प्रतिबंध

हम जो चाहेगें सब वही खायेंगे
        जैन धर्म पर्व का बहाना बनाकर महाराष्ट व छत्तीसगढ सरकार ने मास की ब्रिक्री पर दो दिनों के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। पहले यह प्रतिबंध महाराष्ट में 4 व छत्तीसगढ में 9 दिनों के लिए लगाया गया था। दोनों प्रदेश सरकारों द्वारा सुनाया गया यह फरमान सवर्णवादी- ब्राहमणवादी सोच से भरा हुआ है। भाजपा सरकार लगतार समाज में ब्राहमणवादी मूल्य थोप रही है। किसी भी सरकार को यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि लोग क्या खायें क्या पहने। किन्तु देश में भाजपा सरकार यही सब कर रही है।

साम्राज्यवादी कुकर्मों के कारण दर-दर भटकते लोग

      सीरिया से बड़े पैमाने पर लोग अपना घर-बार छोड़कर दर-दर भटक रहे हैं।ये सभी यूरोपीय देशों में शरण लेने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। असुरक्षित यात्रा में कई लोग भूख-प्यास से भी मर जा रहे हैं। बीबीसी के अनुसार इस वर्ष 3 लाख 40 हजार लोग अपना वतन छोड़कर शरण लेने के लिए मजबूर हुए हैं। सीरियाई लोगों का दर्द देखकर यूरोपीय देशों के नागरिकों ने उनका साथ देने के लिए प्रदर्शन किये। इसके बावजूद पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासक शरणार्थियों को अनचाहा बोझ समझकर तरह-तरह के बहाने बनाकर इसे रोकना चाहते हैं। हंगरी ने तो शरणार्थियों को रोकने के लिए तार-बाड़ खड़ी कर दी है। साम्राज्यवादी आईएसआईएस की उनके देश में घुसपैठ का बहाना बनाकर शरणार्थियों को शरण देने में अडंगे लगा रहा है। इस सबके बावजूद एक दिन भी ऐसा नहीं गया जबकि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों ने मानवता के नाम पर झूठे आंसू ना बहाये हों।

4 September 2015

बदलाव लाने में अक्षम यह लोक लुभावन फैसला

        इलाहबाद उच्च न्यायलय ने 18 अगस्त 2015 को बेहद ‘लोकप्रिय’ फैसला सुनाया। यह फैसला कहता है कि सभी सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, जज, जनप्रतिनिधि अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ायेंगे। न्यायलय के इस फैसले के बाद तमाम बुद्धिजीवी बेहद खुश नजर आ रहे हैं। वे इसे सरकारी स्कूलों के हालात में सुधार व पैसे के आधार पर शिक्षा में भेदभाव की समाप्ति के तौर पर देख रहे हैं।

3 September 2015

प्रो. एम.एम. कुलबर्गी की हत्या का विरोध करो!

        प्रो0 एम0एम0 कुलबर्गी को तर्कपरकता और धार्मिक अंधविश्वास का विरोध करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। प्रो0 कुलबर्गी हम्पी यूनिवर्सिटी के पूर्व वायस चांसलर (कुलपति) थेे और अपने लेखों व लिखी किताबों के द्वारा धार्मिक पोंगापंथ का विरोध करने का काम करते रहे थे। उनकी 30 अगस्त को उनके घर पर ही गोली मारकर हत्या कर दी गयी। अपने काम के कारण उनको लंबे समय से हिन्दू फासीवादी संगठनों द्वारा आलोचना व धमकी का शिकार होना पड़ा था।