27 March 2020

कोरोना महामारी के दौरान मजदूरों एवं गरीब तबके के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करो।

इस दौरान भ्रांतियां और अंधविश्वास फैलाने वाले तत्वों के खिलाफ कार्यवाही करो।


कोरोना वायरस के प्रकोप से पूरी दुनिया जूझ रही है। भारत समेत कई देशों की सरकारों द्वारा इस महामारी से निपटने को ‘लाॅक डाउन’ जैसे आपातकालीन कदम उठाये गये हैं।


25 March 2020

इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है

प्रिय साथियों,
आशा है आप स्वस्थ होंगे

'कोरोना' नामक महामारी के चलते हमारे संगठन की गतिविधियां बुरी तरह से बाधित हो गई हैं। हम अपने साथियों सहित जनता से कट गए हैं। यह स्थिती अभी कई दिन कायम रहनी है।

6 March 2020

8 मार्च: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

शिगूफे- प्रपंच की कोई जगह नहीं

8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय मजदूर महिला दिवस जो कि वास्तव में महिला मजदूरों की पूंजीवाद के खिलाफ लंबी संघर्ष गाथा का एक प्रतीक दिवस है। पूरी दुनिया में ही मजदूर-मेहनतकश महिलायें इस दिवस को मनाने की जोर-शोर से तैयारी कर रही हैं। विगत दशकों में देश-दुनिया का कोई भी ऐसा संघर्ष नहीं रहा जिसमें महिलाओं की शानदार, प्रेरणादाई भूमिका ना रही हो। भारत में ही देखें तो पूरे देश भर में सीएए/एनआरसी/एनपीआर के विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं की शानदार भूमिका रही है। शाहीन बाग जैसा संघर्ष का मजबूत किला महिलाओं के दम पर ही बनाया जा सका। तमाम दुख,कष्ट, दमन का इन महिलाओं द्वारा बहुत बहादुरी से मुकाबला किया गया। इनके हौसले के सामने दुख और दमन दम तोड़ता नजर आया।

5 March 2020

दिल्ली सुनियोजित हमलों द्वारा शाहीन बाग आंदोलन को कुचलने की संघी कोशिश को ध्वस्त करो

अपने जन्म से ही संघ व संघ जैसे दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा जनता के बीच मुस्लिमों की कट्टरता, क्रूरता को लेकर एक से बढ़कर एक झूठ फैलाए गए हैं। CAA, NRC/NPR विरोधी आंदोलन की शुरूआत में राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा को भी वो मुस्लिमों द्वारा की गयी हिसा के रूप में प्रचारित करने में सफल रहे। परंतु उसके बाद पैदा हुए शाहीन बाग आंदोलन ने उसे बैकफुट पर धकेल दिया।

भारत के इतिहास में ये एक नए तरीके का आंदोलन था। जिसमें मुस्लिम महिलाओं (जिन्हें सबसे पिछड़ा हुआ माना जाता था) ने भारी संख्या में भागीदारी की। बात केवल भागीदारी तक नहीं रही अधिकांश जगहों पर मुस्लिम महिलाओं ने इस आंदोलन का नेतृत्व भी किया। पूरे आंदोलन का स्वरूप अहिंसावादी और धर्मनिरपेक्ष बनाकर रखा गया। सभी धर्मो के लोगों को इस आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की गयी। पुराने नेतृत्व को नकारते हुए लगभग सभी जगह नए नेतृत्व ने आंदोलन की कमान संभाली। सदियों से जिनसे बोलने का हक छीन लिया गया था वो स्टेज पर चढ़कर घंटो भाषण देने लगे। यही नही बाहर से भागीदारी करने वाले प्रगतिशील संगठनों द्वारा भी इस आंदोलन की चेतना को आगे बढ़ाने का काम किया गया। 

26 February 2020

संघर्षरत गुजरात अंबुजा के मजदूरों के समर्थन में....


गुजरात अंबुजा सिडकुल मजदूर अपनी जायज मांगों को लेकर पिछले माह 28 जनवरी से संघर्षरत हैं। यह कंपनी उत्तराखंड राज्य के ऊधम सिंह नगर जिले के एक औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल सितारगंज में स्थित है। कंपनी मक्के से स्टार्च का निर्माण करती है और उसे अन्य कंपनियों को सप्लाई करती है। इसी से शहद, होरलिक्स, आदि खाद्य पदार्थों का निर्माण होता है। कंपनी मालिक के साथ उत्तराखंड सरकार मजदूरों की मांगों को नहीं सुन रही है। उत्तराखंड सरकार भी पूजीपतियों के साथ खड़ी है और हर संभव तरीके से आंदोलन का दमन करने में लगी है। परिवर्तनकामी छात्र संगठन गुजरात अंबुजा के मजदूरों के साथ अपनी एकजुटता जाहिर करते हुए उत्तराखंड सरकार से मांग करता है कि वह अपनी मजदूर विरोधी दमनकारी नीतियों को छोड़ते हुए मजदूरों की मांगों को जल्द से जल्द पूरा करे।

6 January 2020

जेएनयू छात्रों पर कायराना हमले के विरोध में

5 जनवरी की शाम 7 बजे के आस पास जेएनयू में कुछ गुंडे डंडे, लाठियों और चाकू को हाथ में लेकर कैंपस में घुस गए और हाॅस्टल में छात्रों के साथ मारपीट की और तोड़फोड़ की। छात्र संघ अध्यक्ष सहित कई छात्रों को बुरी तरह से घायल कर दिया। परिवर्तनकमी छात्र संगठन इस कायराना हमले की कठोर शब्दों में निंदा करता है और मांग करता है कि इस हमले के दोषियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाय।

13 December 2019

'सीएबी' संघी फासीवादियों का नया विभाजनकारी एजेण्डा

        ‘नागरिकता संशोधन विधेयक’ (सीएबी) लोक सभा और राज्य सभा दोनों में पास हो गया है। इस विधेयक के जरिये भाजपा ने अपने घोर सांप्रदायिक चरित्र को एक बार फिर उजागर कर दिया है। इस विधेयक में धर्म को आधार मानकर नागरिकता देने का प्रबंध भाजपा की सरकार ने कर दिया है। इसके जरिये भाजपा ‘हिन्दू राष्ट्र’ के अपने फासीवादी एजेण्डे को लागू कर रही है। लंबे समय से संघ और भाजपा अपने हिन्दू राष्ट्र का सपना पाले हुए थे। अब वे इसे तेजी से जमीन पर उतारने की ओर आगे बढ़ रहे हैं। यह विधेयक इसी उद्देश्य से प्रेरित है।

यौन हिंसा एनकाउण्टर और हमारा समाज

       27 नवम्बर हैदराबाद में 26 वर्षीय वेटनरी डॉक्टर की गैंग रेप कर नृशंस हत्या कर दी गयी। समाज में महिलाअें के खिलाफ हो रहे ऐसे नृशंस अपराधों में क्षुब्ध व आक्रोशित तमाम लोगों द्वारा हैदराबाद सहित पूरे देश में ढेरों प्रदर्शन किये गये। रोज ब रोज महिलाओं के साथ आपराधिक घटनायें हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है। घृणित पूंजीवादी व्यवस्था महिलाओं को सुरक्षा व बराबरी देने में सर्वथा अक्षम रही है। या ज्यादा सही कहें तो यह पूंजीवादी व्यवस्था ही मुख्यतः, मूलतः ऐसे अपराधों के लिए जिम्मेदार है। यह व्यवस्था पुरुषप्रधानता की सोच को बनाये हुए है। अश्लील उपभोक्तावादी संस्कृति को पाल-पोस रही है और समाज में कुण्ठित-विकृत मानसिकता के लोगों को पैदा कर रही है। 

2 December 2019

तुम तो हम जैसे ही निकले अब तक कहां छुपे थे भाई! वो मूरखता-वो घामड़पन जिसमें हमने सदी गंवाई !!

   


        कुछ सालों पहले पाकिस्तान की मशहूर मानव अधिकार कार्यकर्ता फहमीदा रियाज ने उक्त पंक्तियां भारत के हाल को देखते हुए लिखी थी। इस कविता के माध्यम से वो बता रही थी कि भारत का हाल भी पाकिस्तान की तरह ही होता जा रहा है। अभी 1 साल पहले ही उनका देहांत हुआ है।

20 November 2019

फीस वृद्धि के हमलों का बहादुरी से सामना करते छात्र


         छात्रों का बहादुराना संघर्ष जिंदाबाद !

         जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र पिछले कई दिनों से फीसवृद्धि का विरोध कर रहे हैं। सरकार द्वारा बोले गये इस बड़े हमले का विरोध जरूरी था। छात्रों के बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन करने और फीसवृद्धि वापस करने की मांग को कुलपति ने अनसुना कर दिया। कान में तेल डाले और आंखों पर काली पटटी बांधे जेएनयू कुलपति संघी सरकार के कुशल स्वंयसेवक का रोल अदा करते हुए अड़ियल रुख पर कायम हैं। वकीलों से झगड़ा होने पर न्याय की गुहार लगाने वाली दिल्ली पुलिस छात्रों से बर्बरता से निपट रही है। दिल्ली पुलिस ने सरकार के इशारे पर जेएनयू छात्रों का सिर फोड़ा और उनके कपड़े खून से रंग दिये। उनको सड़कों पर घसीटा और जेलों में कैद कर दिया। इतने जुल्मों सितम के बाद भी जेएनयू के छात्र बहादुरी के साथ मैदान में डटे हैं। वे सरकार के शिक्षा को महंगा करने और शिक्षा के निजीकरण की इस मुहिम के सामने लोहे की दीवार की तरह खड़े हैं।